Tuesday, June 9, 2026

क्षितिज comp.

                        🌸बदलाव 🌸
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     आज तरुण के फोन कॉल से नीता  घबरा गयी। । यूँ तो माँ -पा के एक्सीडेंट में गुज़रने के बाद वह  रोज़ बात करता है पर आज उसकी आवाज़ में बहुत निराशा थी।पति अजय ने तब कहा भी '  यहीं बुला लो ।  संभल जायेगा । अकेला कैसे रहेगा '?
 तब  उसने ही टाल दिया था। सास -ससुर को शायद उसका यहाँ रहना पसंद न आये । प्रेम विवाह के कारण दोनों  उससे दूरी बनाये रखते हैं। बस मस्तमौला देवर आलोक है जो मन लगाए रखता है।
   क्या बात करना ठीक रहेगा अभी ?  सोचते सोचते नीता बैठक में आ गयी।  उसे आता देखा पापाजी ने टीवी बंद कर दिया।
नीता  ने  रमा से पूछा  -- -:'ममी जी ! तरुण बहुत परेशान  है।  अगर यहाँ  रहे तो ?  उसे  कॉलेज में आलोक का साथ  भी मिल जायेगा। 
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं मम्मी जी -
' -  यहाँ  -?   नहीं, यह कोई धर्मशाला है ?  तुमने सोचा भी कैसे?  मेरा घर है मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना  तुम यहाँ हो, यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती । 
 नीता -- ' मम्मीजी ! ऎसा क्यों बोल रहीं ?  इस उम्र में वह बिगड़  सकता है। मेरे अलावा है कौन उसका ? 
रमा  - बिल्कुल नहीं ।  तुम ही चली जाओ वहाँ ? बहू हो तो यहाँ बहू की तरह  रहो। घर पर हक़ न जताओ'। 
-- '  यह मेरा घर नहीं ? प्लीज़ , आने दीजिये ममीजी ! उसकी  ज़िन्दगी बन जायेगी। अकेला वह कहीं कुछ कर न बैठे ?'
नीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की  ज़िद जीत  तो गयी पर  मुझे  न घर मिला न अपनापन।
  आगे बढ़ती बहस  के  बीच ससुर जी बोल पड़े '  ' क्यों रमा ? यह बहू का  घर नहीं ? तरुण  यहाँ क्यों नहीं रह सकता ? आलोक का यह ध्यान  रखती है न  ?
रमा - ' मैं  जो चाहूँगी वही होगा ।आप मत बोलो बीच में।'
 ससुर जी का धैर्य  जवाब दे गया । चीख पड़े, ' अच्छा !सिर्फ तुम्हारा घर  ?  मेरा नहीं ?  बेटों का नहीं ? इसका नहीं ?  सुनो !  यह घर  सिर्फ मेरा है। खून पसीने से बनाया है पर है सबके लिए । '
-- ' बहू ! तरुण को बुला लो। तुम बहन हो अब माँ की तरह  उसका ख्याल रखना - मेरे आलोक का भी' । 
- वे बोलते गए - ' रमा !  बेटी का अरमान था तुम्हें। बेटी सी बहू मिली है। इसका  कोई हक़ नहीं ?  समझ लो, अब तरुण तीसरे बेटे की तरह यहीं रहेगा।
' उनका  स्वर भीगने लगा । नीता ससुर जी का  यह वात्सल्य रूप देखती रह गयी।  उसकी सवाल भरी नज़रें रमा की ओर उठ गयीं। रमा के चेहरे के रंग लगातार बदल रहे थे। फिर एक कोमल भाव ठहर गया। कुछ सोचते हुऐ  सिर झुकाये बोलीं   ' अजय आये तो मुझसे बात करने को कहना। नीता !  खाना लगा दो।'  वे धीमे  कदमों से डाइनिंग टेबल की ओर  बढ़ गयीं। '
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                         * किसका घर ? *
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  मोबाइल की  घंटी बजते ही नीता ने झट से  ऑन किया। बोली '-  हेलो! । आतुर तरुण बोल पड़ा ' दीदी आज सपना देखा, पता है सपने  में माँ पा दिखे । जैसे अस्पताल में अपना इंतज़ार कर रहे हों। आप आ जाओ न यहीं ' ।
 ' नीता ने समझाया '  एक काम करो तुम ही आ जाओ। अब मैं बार बार कैसे आ पाऊँगी? समझ न। 
उसकी हताशा ने चिंता में डाल दिया।सोचा माँ जी से बात कर के देखूँ. वही यहाँ आ जाये?  पर सासु जी और ससुरजी मानेंगे ? उसके प्रेम विवाह  के कारण वे थोड़ी दूरी बनाये रखते हैं। सोचते हुई वह बैठक  में नीता आ गयी। दोनों समाचार सुन रहे थे।  उसे आता देख ससुर जी ने टीवी बंद कर दिया।
 नीता -- ' मम्मी जी तरुण बहुत हताश है।अकेला पड़ गया है।कहीं कुछ गलत न कर बैठे ? क्या वह यहाँ आकर रहसकता है ? उसे  आलोक का साथ मिल जायेगा । .
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं  मम्मीजी -
' नहीं,यहाँ क्यों ? यह कोई धर्मशाला नहीं ?  मेरा घर है यह मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना  तुम हो यहाँ यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती ।  
सुनीता -- ' मम्मीजी!  क्या कह रहे हो ?   इस उम्र में वह बिगड़  सकता है.। माँ बाबा के एक्सीडेंट में जाने के बाद मेरे अलावा उसका  कोई  नहीं। 
 --'  कहा न ,यहाँ नहीं रहेगा वह।  तुम  चाहो तो  जाओ। वरना बहू हो बहू की तरह यहाँ  रहो।  कोई हक़ न जताओ'। 
नीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की ज़िद जीत तो गयी पर  मुझे  न घर मिला न अपनापन।
बहस रोकते  ससुर जी  बोले ' दोनों रुको।  क्या कहती हो साधना ? यह घर बहू का नहीं? तरुण  क्यों नहीं रह सकता ? आलोक का बहू  ध्यान  रखती है न ?
सासु जी - कह दिया ना । जो चाहूँगी वही होगा इस घर में। आप मत बोलो बीच में ' ।
गंभीर स्वभाव के ससुर जी का धैर्य  जवाब दे गया। चीख पड़े, -- ' तुम्हारा घर  ?  मेरा नहीं ? दोनों  बेटों का नहीं ? इसका नहीं?   तो सुनो।  यह घर मेरा है सिर्फ मेरा। खून पसीने से बनाया है, पर सबके लिए । 
बहू !   तरुण को बुला लो । बहन हो अब माँ की तरह उसका ख्याल रखना ।  आलोक का भी।ठीक ?
-  साधना!  -  तुम्हें तो बेटी चाहिए थी ? अब  बेटी सी बहू मिली तो उसकी चिंता समझो। हमारे  बाद यही  सबका ध्यान रखेगी ।  समझ लो। अब तरुण यहीं तीसरे बेटे की तरह रहेगा।  
 सुनीता गंभीर स्वभाव के ससुर जी का यह वात्सल्य रूप  देखती रह गयी।  उसने सवाल भरी नज़रों से साधना को देखा ।
  साधना के चेहरे के रंग बदलते गए।  फिर एक कोमल भाव ठहर गया।धीमे से बोलीं --' हम्म्म्म,  अजय आये तो बताना। खाना लगा दो नीता! धीमे कदमों से वे दोनों को डाइनिंग टेबल की ओर   बढ़ गयीं।
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