========
एक फोन कॉल ने सुनीता को चिंता में डाल दिया । अजय ने पूछा - 'क्या हुआ किसका फोन है ' ?
--तरुण का। माँ -बाबा के जाने के बाद अकेला हो गया है। बहुत उदास और हताश है। पूछ रहा - कब आओगी?
अजय ने तुरंत कहा --' बुला लो उसे यहीं. तुम कब तक रहोगी ? उसका मन लग जायेगा यहाँ ।
सुनीता -- सही, पर कैसे ?मम्मी जी - पापा जी नहीं मानेंगें ।
अजय- मान जायेंगे, भाई है तुम्हारा। हम साथ नहीं देंगे तो बिखर जायेगा । रहे- पढ़े जब तक उसका मन हो ।
सुनीता -- उम्मीद कम है पर दोनों मान जायें तो अच्छा होगा। ससुराल है सो वह भी कम आता है।
अजय - तुम बात करो, तैयार होकर आता हूँ मैं भी।
वह कमरे से बाहर आयी तो देखा बैठक में सास - ससुर टीवी पर समाचार देख रहे थे। उसे आता देख ससुर जी ने टीवी बँद कर दिया। सुनीता ने धीरे से बात शुरू की।
-:'ममी जी! तरुण बहुत परेशान है। ठीक से पढ़ नहीं पा रहा है। अगर यहाँ आ जाए तो उसे हमारा साथ मिल जायेगा और आलोक के साथ कॉलेज भी। मुझे उसकी चिंता नहीं रहेगी'.
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं मम्मी जी -
' क्यों? यहाँ कैसे? उसका घर है तो ? बाई रख ले वहाँ । यह कोई धर्मशाला है ? तुमने सोचा भी कैसे? मेरा घर है यह मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना तुम हो यहाँ, यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती । सुनीता -- ' मम्मीजी! क्या बोल रहे हो आप ? इस उम्र में वह बिगड़ सकता है.मेरे अलावा है कौन उसका ? --' कह दिया। इस घर में नहीं रहेगा वह। तुम चाहो तो रहो वहाँ । बहू हो बहू की तरह रहो। कोई हक़ न जताओ'।
सुनीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की ज़िद जीत तो गयी पर मुझे न घर दे सकी न अपनापन।
बहस के बीच में ही ससुर जी बोल पड़े।
' सुनीता! रुको । और तुम क्या कहती हो साधना ? बहू का यह घर नहीं? तरुण क्यों नहीं रह सकता ?आलोक -तुम्हारे छोटे का ये पूरा ध्यान रखती है न ?
सासु जी - कहा न ? जो चाहूँगी वही होगा घर में। आप मत बोलो बीच में ' ।
आर्मी से रिटायर्ड ससुर जी का धैर्य जवाब दे गया। चीख पड़े, ' अच्छा ! तुम्हारा घर है ? मेरा नहीं ? दोनों बेटों का नहीं ? इसका नहीं? फिर सुनो। यह घर मेरा है सिर्फ मेरा। खून पसीने से बनाया है, पर सबके लिए ।
बहू ! तरुण को बुला लो। घुट -घुट के क्यों रहेगा ? । बहन हो अब माँ की तरह उसका ख्याल रखना । मेरे आलोक के साथ । ठीक ?
- और साधना! ध्यान रखना। अब बहू से कुछ नहीं कहना । तुम्हें तो बेटी चाहिए थी ? अब बेटी सी बहू मिली तो कैसी बात कर रही हो ? हमारे बाद बहू को ही तो सबका ध्यान रखना है। समझ लो, तरुण तीसरे बेटे की तरह यहीं रहेगा।
सुनीता कठोर अनुशासन वाले ससुर जी का यह वात्सल्य रूप देख उन्हें देखती रह गयी। उसकी सवाल भरी नज़रें साधना की ओर उठ गयीं ?
साधना के चेहरे के रंग बदल रहे थे, और फिर एक कोमल भाव ठहर गया। उन्होंने बाई को आवाज दी,' रमा खाना लगा दो, अजय आओ बाहर '। फिर दोनों को डाइनिंग टेबल की ओर चलने का इशारा कर दिया।
=================================
==================================
बदलाव '
========
एक फोन कॉल ने सुनीता को चिंता में डाल दिया । अजय ने पूछा - ' किसका फोन है ' ?
--तरुण का। माँ -बाबा के जाने के बाद अकेला हो गया है। उदास है, हताश भी । पूछ रहा - कब आओगी?
अजय --' बुला लो यहीं। उसके लिए अच्छा रहेगा यहाँ ।
सुनीता -- हाँ! , पर मम्मी जी - पापा जी मानेंगे ?
अजय- भाई है. हम साथ नहीं देंगे तो बिखर जायेगा । यहीं रहे जब तक उसका मन हो । जाओ बात करो मैं भी आता हूँ।
सुनीता -- उम्मीद कम है । दोनों मान जायें तब है। ससुराल है सो वह भी कम आता है।
उसने किचन में जाकर रमा को रोटी बनाने का कहा। बाहर आयी तो देखा सास - ससुर टीवी देख रहे थे। उसे आता देख ससुर जी ने टीवी बँद कर दिया। सुनीता ने धीरे से बात शुरू की।
-:'ममी जी ! तरुण परेशान है। आज बात हुई तो बहुत उदास था। ठीक से पढ़ नहीं पा रहा है। अगर यहाँ रहे तो उसे साथ मिल जायेगा। । आलोक के साथ कॉलेज भी। मैं तो वहाँ रह नहीं सकती। '.
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं मम्मीजी -
' यहाँ क्यों,कैसे? उसका अपना घर है। बाई रख ले । यह कोई धर्मशाला नहीं ? मेरा घर है यह मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना तुम हो यहाँ यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती ।
सुनीता -- ' मम्मीजी! क्या बोल रहे हो आप ? इस उम्र में वह बिगड़ सकता है.मेरे अलावा है कौन उसका ?
--' कह दिया न यहाँ नहीं रहेगा वह। तुम चाहो तो जाओ । बहू हो बहू की तरह रहो। कोई हक़ न जताओ'।
सुनीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की ज़िद जीत तो गयी पर मुझे न घर दे सकी न अपनापन।
बहस और आगे बढ़ती पर बीच में ससुर जी बोले ' सुनीता! सब सुना । क्या कहती हो साधना ? बहू का यह घर नहीं? तरुण क्यों नहीं रह सकता ?आलोक तुम्हारे छोटे का ये पूरा ध्यान रखती है न ?
सासु जी - कह दिया न जो चाहूँगी वही होगा इस घर में। आप न बोलो बीच में ' ।
आर्मी से रिटायर्ड ससुर जी का धैर्य जवाब दे गया। चीख पड़े, ' तुम्हारा घर है ? मेरा नहीं ? दोनों बेटों का नहीं ? इसका नहीं? तो सुनो। यह घर मेरा है सिर्फ मेरा। खून पसीने से बनाया है, पर सबके लिए ।
बहू ! तरुण को बुला लो। घुट -घुट के क्यों रहे ? । बहन हो अब माँ की तरह उसका ख्याल रखना । आलोक के साथ ही । ठीक ?
- साधना! बहू से कुछ नहीं कहोगी । तुम्हें तो बेटी चाहिए थी ? अब बेटी सी बहू मिली तो कैसी बात कर रही हो ? हमारे बाद बहू ही तो सबका ध्यान रखेगी । समझ लो तरुण तीसरे बेटे की तरह रहेगा।
सुनीता कठोर अनुशासन वाले ससुर जी का यह वात्सल्य रूप देख उन्हें देखती रह गयी। उसकी सवाल भरी नज़रें साधना की ओर उठ गयीं ?
साधना के चेहरे के रंग बदलते गए, और फिर एक कोमल भाव ठहर गया। उन्होंने आवाज दी,' रमा खाना लगा दो, अजय बाहर आओ '। सिर झटका कर दोनों को डाइनिंग टेबल की ओर चलने का इशारा कर दिया।
=================================
==================================