katha
Tuesday, June 9, 2026
क्षितिज comp.
क्षितिज के लिए जून।
चैटिंग*🌸 । -------------- जब देखो तब रोमा मोबाइल पर व्यस्त रहती। यहॉँ तक कि खाते समय भी। माँ सुनीता परेशान हो जाती, न आँखों का ध्यान न समय का। आज तो हद हो गयी स्कूल जाने का समय हो गया और अभी तक रोमा तैयार ही नहीं हुईं। चिल्ला पड़ी अब तो--- ' दिन भर चैटिंग करती रहती हो ? बेटा ! पढ़ाई नहीं करना ? एग्जाम हैं न अगले माह, आखिर बारहवीं का बोर्ड है न? -- अरे माँ! उसी के लिये तो कृष्णा से चैट कर रही देखो, नोट्स शेयर कर रही।उद्धत सुर में सोमा ने जवाब दिया। --- स्कूल नहीं जाना ? इतना टाइम लग रहा तो उस के घर जाकर लिख लाओ ? दिखाओ ? थोड़ा तो मैं ही बता दूँगी।' सुनीता ने हाथ बढ़ा दिया मोबाइल लेने के लिये।रोमा सकपका गयी, - ' नहीं न। आपको क्या समझ आएगा ? शार्ट में है सब।'- फिर तैयार होने चली गयी। सुनीता बिस्तर ठीक करने लगी। लगा मोबाइल चादर के नीचे से वाइब्रेट कर रहा था। मोबाइल उठा कर देखा श्री कृष्णा के नाम से स्क्रीन झपझप कर रही । ऑन किया तो अजीब उल्टी- सीधी कराहटें सुनाई दीं- ' ' ' माय लव, इलू इलू की..'। चौँक कर झट से काट दी कॉल। देखा उस नाम और नं की सारी चैट डिलीट थी। न नोट्स दिखे न कुछ और। सुनीता की दिल बैठ गया। अब ? रोमा से अभी कुछ कहना बेकार है। इस उम्र में सुनेगी - मानेगी नहीं । जल्दी से नंबर डायरी में लिख लिया। अब रात को रोमेश से बात करके ही तय करेगी,आगे क्या कैसे?
Monday, May 25, 2026
पढ़ाई का बोझ --
Monday, November 4, 2024
तरु --
Tuesday, September 10, 2024
व्यवहारिक शिक्षा
किताबी शिक्षा और व्यवहारिक शिक्षा में अंतर हैं। किताबी ज्ञान एक तरह से औपचारिक ही है। जीवन के लिये कैसी शिक्षा उपयोगी होगी? यह नहीं देखा जाता। शिक्षा व्यवस्था में परम्परागत विषय पढ़ाये जातें हैं। एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग इनसे जीवन नहीं निकाल पा रहा। लिखित रूप में क्या विषय है ? काम कैसे करना चाहिए ? आदि नहीं सिखाया जाता।। वहीं व्यावसायिक शिक्षा में हमें व्यावहारिक तौर पर सिखाया जाता है क्या काम /जॉब कैसे करना है?किताबी शिक्षा से ज्ञान बढ़ता है. कोर्स की औपचारिक डिग्री जरूर मिलती है। लेकिन व्यवहारिक शिक्षा से हम सीखते हैं कि कैसे किसी काम को असली जीवन में कैसे लागू करना है। आने वाली स्थितियों में कैसे संतुलन करना है। काम करने की कुशलता और उसे स्तरीय बनाना अलग बात है। इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आस -पास के माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता है। स्कूल- कॉलेज आज भी डिग्री ही दे रहे हैं। बाकी ओर उनका ध्यान कम ही है। इसलिए प्रशिक्षण और कोचिंग संस्थान बहुत बढ़ रहे हैं। मेडिकल,इंजीनियरिंग और विज्ञान के विषय में भी प्रैक्टिकल जरूर होते हैं। फिर भी वे रोज़गार और बाह्य संस्थानों और रोज़गार के उपयुक्त कम ही हैं। स्पष्ट है कि उद्योगों के अनुरूप जॉब और अभ्यर्थी नहीं मिल रहे। आज की प्रतिद्वन्दी समाज और माहौल में यह सबऔर अधिक संवेदनशील होता जा रहा है।प्रशिक्षण, जॉब, कुशलता और सफलता पाना कठिन हो रहे है। इसलिए ही उनमें मानसिक और सामाजिक विचलन भी दिख रहे हैं। व्यावहारिक शिक्षा की जरूरत समझी तो जाती है। पर इसके अवसर आज भी कम और महेंगे भी। सर्वसुलभ तो हैं भी नहीं। ऐसे में संभावनाएं अंनत हैं। इस और अकादमिक क्षेत्र,सरकार, उद्योगों और संस्थानों के नियोजित प्रयास जरुरी हैं पर कब कौन कैसे करेगा? यह नहीं कहा जा सकता।
औपचारिक शिक्षा व्यवस्था अब कह सकते हैं मज़बूत होने की बजाय सक्षम नहीं कही जा सकती। निजी क्षेत्र में शिक्षा बहुत महंगी, सरकारी - अक्षम और बाकी एक बड़े वर्ग के लिये उपयुक्त नहीं रही। शिक्षा नीति बनती है पर उसका क्रियान्वयन का हाल ठीक नहीं। पूरे देश में 20-30% ही उपयुक्त हैं बाकी सब अनियमित, अक्षम और अनुपयुक्त। ऐसे में निराश, बेरोज़गार , अक्षम - श्रम शक्ति ही बढ़ चुकी है। देखा जाए तो आमूलचूल नयी व्यवस्था की जरुरत है हर स्तर पर। प्राइमरी, स्नातक और फिर तकनीक विषयों की शिक्षा के लिये। समाज में स्थापित होने के लिये शिक्षा के साथ अन्य नैतिक - सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी जरुरी है। इंसान मशीन की तरह भी काम नहीं कर सकता। मानवीय व्यवहार का दृष्टिकोण आज बहुत जरुरी है। इन दोनों को साथ जोड़ कर ही सर्वाँगींण शिक्षा दी जाये वही देश के लिये उपयुक्त होगा।
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