Friday, July 17, 2026

ग्रहस्वामिनी

    🌸कैसा ऐतबार?" 🌸
     ============≠=
       .सिया और  रोशन एक ही कॉलेज में साथ पढ़ते आये। तीन साल पहले रोशन पास के कस्बे से पढ़ने आया था। हॉस्टल का अनुशासन उसे रास नहीं आना था।  एक अलग कमरा किराये पर लेकर कर रहना पसंद किया।   उसकी मंशा  शहर  के माहौल में वह आज़ाद पंछी की तरह उड़ने की थी ।  यूँ भी एक दूर के भाई के अलावा यहाँ और कोई था नहीं उसका। उनसे  भी वह काम होने पर ही मिलने जाता। वरना बस कॉलेज और घुमक्कड़ी यही शौक  बन गए उसके। अपनी मित्र मण्डली बना रोज़ शाम  को टपरी पर चाय के साथ गपशप करना शगल था उसका। ये सब क्लास में कम और खेल के मैदान में ज्यादा दिखते ।  पास होने लायक नंबर आ जाएँ इससे ज्यादा वह नहीं सोचता। स्वभाव से खिलन्दड़ और हँसमुख  राकेश जल्दी ही  मशहूर हो गया। छोटी सी बात को भी  ऐसे बढ़ा -चढा कर कहता कि मित्र मंडली उसपर  या तो भरोसा कर लेते या  फिर  हँस देते।
   सिया भी उनमें  से एक थी ।  व्यवसायी परिवार की इकलौती  लाड़ प्यार में पली बेटी। थोड़ी ज़िद्दी थोड़ी  सरल।  उसकी  लच्छेदार  बातों पर खूब हँसती । सिया के सीधे - सादे  रूप और मासूमियत से  रोशन जैसा तेज़ तर्रार लड़का भी आकर्षित हो गया ।  धीरे - धीरे दोनों प्यार की गिरफ्त  में  आ गए।  वे रोज़ मिलते और   अपनी  निजी  बातें भी शेयर करने लगे।  जो सिया  कभी किसी से खुल कर नहीं मिलती पर वह  रोशन से  अपने आप को छुपा नहीं पाती।अपने घर की हर बात शेयर कर देती। 
       " बीस साला प्यार 'में  डूबे दोनों ने कस्मे -वादों  की लम्बी फेहरिस्त भी बना ली।  रोज़ कॉलेज आते-  जाते मिलते और अक्सर छुट्टी के दिन सिनेमा या नाटक देखने चले जाते। देर रात नींद नहीं आती तो मोबाइल पर गपियाते रहते। जब जेब खाली होती तो पार्क के किसी कोने में गपशप  करते। सिया का उस पर इतना विश्वास कि अपने घरवालों की रोक-  टोक भी उसे भली नहीं लगती। माँ की समझाइश   और भाई की तीखी  नज़र उसे चुभती रहती।  बेपरवाह हो उसने  रोशन को अपना सब कुछ मान लिया माँ -बाबा से भी ज्यादा ।  
 उसकी दोस्त आरती   यह सब समझ कर  कई बार बोली भी '  ' बहना, आजकल पढ़ाई में मन नहीं लग रहा, क्या बात है ?  रोशन पर  इतना ऐतबार अच्छा नहीं।  मनचला  सा लगता है। कितना जानती हो उसके बारे में  ?  उसके घर वालों को जानती भी हो?।' 
  सिया ने  सुन तो  लिया पर   तेज़ी से जवाब  भी दे दिया "  हाँ!.तुमने देखा न  ?, अरे, कितना पसंद करता है मुझे ? जान देने को तैयार रहता है। बोल रहा था, अब हम साथ रहेंगे जीवन भर "। कितनी मदद करता है पढ़ाई में मेरी, कल ही  किताबें और नोट्स दिए हैं। ? पता है न ?' बताते हुए उसके चेहरा सिंदूरी हो आया। 
 आरती ने उसे फिर समझाया " पढ़ाई  तो पूरी कर लो, फिर सोचना और कुछ।  बाकी जो करना है कर।  पता है उसका घर- बार कुछ खास नहीं है। तेरा गुज़ारा नहीं होगा उसके साथ। रुक जा कुछ साल।  पढ़ने दे और नौकरी तो करने दे उसे।  फिर मत कहना चेताया नहीं तुझे।  अख़बार नहीं पढ़ती? आजकल ऐसे मामलों की खबर ज्यादा आ रही है। मुझे वह ठीक नहीं लगता। कितना शो ऑफ़ करता है। बाबा रे। "
 सिया ने उसकी बात हँस कर उड़ा दी।'  जाने दे तुम नहीं समझोगी '।
  उसकी आँखों में  रोशन की छवि छायी हुई थी। बेचैनी बढ़ी तो उसे कॉल कर बुला लिया  कैंटीन के पीछे।  पूरे अधिकार से पूछा ' क्या सोचा है तुमने ?  -" कब  साथ रहेंगे हम ? पता है लोग बात बनाने लगे हैं। ". रोशन  को  जैसे मौका मिल गया, उसके मन की बात जो पूछ ली सिया ने। बोला " देखो, मैं अकेला रहता हूँ। क्या बताऊँ ? पढ़ाई भी इस साल खत्म होगी  उसके बाद ही कुछ काम -धंधा कर पाउँगा। अभी मेरे पास तो कुछ है नहीं ज़्यादा। अकेला क्या करुँगा?  घर तो नहीं चला पाउँगा।   रिया  इशारा समझ कर खुश हो गयी।  कहा "तुम चिंता क्यूँ करते हो, मैं भी तो कुछ कर सकती हूँ। रुको दो -तीन दिन। ' 

 जिद्दी रिया अपना वादा पूरा करे पर तुल गयी।  तीन दिन बाद ही वह घर से अपने कुछ कपड़े,  जमा राशि और कुछ गहने लेकर चुपचाप उसके कमरे पर पहुँच गयी  .  रोशन उसके तेवर देख चौँक गया।   ऊपर से सामान्य होने की कोशिश की पर  मन में  जैसे लड्डू फूटने लगे। उसकी मंशा अपने आप  पूरी जो हो रही थी। उसने भी बोरिया बिस्तर  बाँध लिया। सब सामान समेट कर तैयार हो गया। 
          प्यार में डूबी सिया  को रोशन के सिवा कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। रोशन ने एक कॉल लगाया और फुसफसा कर बात की। सिया के पूछने पर टाल दिया "मेरा दोस्त है उसी को किया  फोन। चलो तुम तो।' वह उसे अपने एक  दोस्त समीर  के यहाँ ले गया,
 बोला " रिया! तुम्हारे घर वाले तुम्हें ले न जायें।  इसलिए इस के साथ  रहना होगा कुछ दिन। " सिया ने हामी भर दी । . सपनों में खोयी  सिया ने उस दोस्त और उसके घर पर  ध्यान नहीं दिया। जबकि वह नशे में था, बेहाल सा,और घर में भी कोई ढंग का समान नहीं था । जो था वह भी  मामूली   और बिखरा हुआ। उसने सिया को  दूसरे कमरे में भेज दिया। वे दोनों बाहर धीरे - धीरे बात करने लगे।
सिया को कुछ सुनाई नहीं दिया।  बाजार से मंगा कर चाय- नाश्ता दे कर रोशन ने उसे आराम करने को कह दिया।  सिया को तो अपना घर बसाने की तमन्ना थी। ,बोली 'अब आगे ? यहाँ कब तक रहेंगे। यहाँ अच्छा नहीं लग रहा। चलो कहीं और.।  नौकरी करनी होगी न ?वरना कैसे चलेगा काम '? .
 रोशन ने लापरवाही से कहा ' क्या जल्दी है ? आराम से रहो। हो जायेगा सब इंतज़ाम।  सिया ने फिर पूछा " पैसे कहाँ से आएंगे। जो लायी हूँ वो कभी तो ख़त्म  होंगे न ? ज्यादा  हैं  भी नहीं। "  राकेश झटके से तुरंत बोला  " कम हैं   ? अरे! मुझे लगा तुम बंदोबस्त करके आयी होगी? '  कुछ सोचा नहीं तुमने ? चलो ये है ना समीर,ये दे देगा.'
    सिया को शंका होने लगी '  क्यूँ देगा ये ? इसकी हालत देखी ? लगता नहीं ये कुछ खास कमाता होगा। फिर  चुकाओगे  कैसे "? 
राकेश ने धीरे से कहा " तुम चुकाओगी ना, मेरे और उसमें कोई फर्क नहीं।  तुम्हें उसके साथ भी ऐसे ही रहना होगा। कल इसका भाई भी आ जायेगा। और काम  कहाँ है  मेरे पास ?. " सुन  कर सिया सन्न रह गयी, "  मतलब क्या है ? पूछ  बैठी  ' सौदा करोगे "?  
राकेश बेशर्मी से बोला " ना तो ऐसे ही  खिलाने रखा है उसने हमें ?  सुनो, कल दो दिन के लिए गाँव जा रहा हूँ. अम्मी से बात   करने, तुन्हें यहीं रहना होगा। वो भी उसके हिसाब से।मैं पहले जा कर वहाँ बात करके आता हूँ। तब ले चलूँगा तुम्हें घर। 
  रिया हैरान, - ' हैं,! ?  पूछ कर आओगे? 'क्या मतलब है इसका ?-
यही कह पायी। रिया बिना कुछ कहे  अंदर कमरे में  चली गयी.अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया। अब उसे आरती की चेतावनी याद आ गयी। माँ की परखती नज़र भी। डर गयी अब क्या होगा  ? उसने तो रोशन को  कभी स्पर्श  तक नहीं करने दिया। बाकी सब मुहंजबानी  ख्याली पुलाव ही पकाती रही अब तक।  उसका परिणाम यह निकलेगा ?  अम्मी? ये क्या हुआ इसकी मम्मी अम्मी कब से बन गयी? सही सुना या नहीं - अम्मी अम्मी दिमाग़ में घूमने लगा ये सम्बोधन।   क्या होगा अब आगे ? कुछ सोच कर आरती को ही फोन  किया। रुआँसी  हो आयी, पर सब बता दिया। वह भी चौंक गयी सिया के दुस्साहस से,  बोली " अब पता चला ? कहा गयी धोखा? मना किया था तुम्हें? अच्छा रुको, अभी कुछ मत बोलना रोशन से.  कुछ करती हूँ.अपनी लोकेशन और पता भेजो जल्दी। . कैसे भी बहाना  करके तुम शाम पाँच बजे घर के बाहर गेट के पास रहना।  ठीक ? घबराना  मत और जगह भी मत बदलना। मोबाइल अपने पास छुपा कर रखना। " 
     सिर दर्द  का बहाना  कर  वह कमरे ही लेटी रही 
 दिमाग़ कुलबुलाता रहा। जिस पर एतबार किया  उसी ने ऐसा धोखा दिया ? प्यार का भूत उतर गया उसका। सीधी थी वह  पर इतनी बेवकूफ भी नहीं की गटर में उतर जाये। आशंका  और घबराहट मन में घुमड़ रही थी।  
     शाम की  चाय की पुकार हुई तो बाहर निकल आयी।चाय पीने कुर्सी पर बैठ गयी पर  नज़र  गेट पर जमा दी। घड़ी देखी, पाँच बजने को आये। दिल धकधक करने लगा। आरती नहीं आयी तो ?  एक छाया दिखी वह तुरंत ख़डी हो गयी। कुर्सी को लात मार गिरा कर भागी गेट की ओर । रोशन घबरा कर उसके पीछे भागता पर कुर्सी से उलझ कर मुहँ के बल गिर गया।  समीर पास  पड़ा डंडा उठा कर दौड़ता इससे पहले ही आरती और उसका भाई गेट खोल कर सामने आ गए। दोनों ने  सिया को बाहर खींच लिया। वह आरती से चिपक गयी  रोते - रोते।  जीप से उतर कर दौड़ते हुए  सिपाही ने  समीर को धक्का देकर गिरा दिया।  उसी के डंडे से  दो जमा दिए  उस पर धाड़ धाड़ । वह दोहरा हो गया। दूसरे ने  रोशन को जकड़ लिया।  दोनों को जीप में धकेल दिया  जो थाने  जाकर ही रुकी । आरती ने सिया को  अपनी कार में बिठाया, पानी पिला  कर कहा " देख लिया अंजाम ? " सिया के मुँह से बोल नहीं फूटे, हाथ जोड़ कर उसके कंधे पर ढलक गयी। आधे घंटे बाद थाने में कार रुकी। समीर और रोशन  हवालत में धकेले गए।  इंस्पेक्टर ने सिया को अलग टेबल पर बुलाया,  पूछताछ की और बयान लिखवाये।  पूरी कहानी सुन कर कहा  ' अच्छे घर की लगती हो।  ऐसी पढ़ाई लिखाई   की है ? बंद कर दूँ तुम्हें भी ?
  सिया आँसू बहाती गठरी बनी बैठी रही।  क्या कहती? सब उसी का रचाया खेल जो था।  कैसे देखे बाहर बेंच पर सिर नीचे किये अपने  पिता और बड़े भईया   को ? वे बैठे थे,  उदास, निराश और शर्मिंदा।  उनकी   आँखों में सवाल ही सवाल थे .  आखिर क्या कमी रह गयी उनकी परवरिश में ?  सिया रोती हुई उनके पैरों गिर गयी। क्या सफाई देती ? आखिर उसके इस अपराध की माफ़ी  तो हो नहीं सकती  । माँ -पिता  का विश्वास खो कर अब क्या करेगी वह ?
 इन चार- पाँच घंटों में उसकी दुनिया बदल चुकी थी।  जैसे फिर नया जीवन मिला हो। वह समझ चुकी थी प्यार के  नशे ने उसे धोखे के कुचक्र में फंसा दिया था । जिस  आरती की उपेक्षा की आज उसी ने नरक में गिरने से  बचाया । नज़र नीचे किये वह यही सोच रही थी कि क्या  अब वह किसी पर ऐतबार कर सकेगी.? माँ-  बाबा और आरती उसे माफ कर सकेगें ? 
______________________=_______________
महिमा शुक्ला 
9589024135
996,सुदामा नगर इंदौर (मप्र )

Tuesday, June 9, 2026

क्षितिज comp.

                        🌸बदलाव 🌸
                      ==========
     आज तरुण के फोन कॉल से नीता  घबरा गयी। । यूँ तो माँ -पा के एक्सीडेंट में गुज़रने के बाद वह  रोज़ बात करता है पर आज उसकी आवाज़ में बहुत निराशा थी।पति अजय ने तब कहा भी '  यहीं बुला लो ।  संभल जायेगा । अकेला कैसे रहेगा '?
 तब  उसने ही टाल दिया था। सास -ससुर को शायद उसका यहाँ रहना पसंद न आये । प्रेम विवाह के कारण दोनों  उससे दूरी बनाये रखते हैं। बस मस्तमौला देवर आलोक है जो मन लगाए रखता है।
   क्या बात करना ठीक रहेगा अभी ?  सोचते सोचते नीता बैठक में आ गयी।  उसे आता देखा पापाजी ने टीवी बंद कर दिया।
नीता  ने  रमा से पूछा  -- -:'ममी जी ! तरुण बहुत परेशान  है।  अगर यहाँ  रहे तो ?  उसे  कॉलेज में आलोक का साथ  भी मिल जायेगा। 
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं मम्मी जी -
' -  यहाँ  -?   नहीं, यह कोई धर्मशाला है ?  तुमने सोचा भी कैसे?  मेरा घर है मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना  तुम यहाँ हो, यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती । 
 नीता -- ' मम्मीजी ! ऎसा क्यों बोल रहीं ?  इस उम्र में वह बिगड़  सकता है। मेरे अलावा है कौन उसका ? 
रमा  - बिल्कुल नहीं ।  तुम ही चली जाओ वहाँ ? बहू हो तो यहाँ बहू की तरह  रहो। घर पर हक़ न जताओ'। 
-- '  यह मेरा घर नहीं ? प्लीज़ , आने दीजिये ममीजी ! उसकी  ज़िन्दगी बन जायेगी। अकेला वह कहीं कुछ कर न बैठे ?'
नीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की  ज़िद जीत  तो गयी पर  मुझे  न घर मिला न अपनापन।
  आगे बढ़ती बहस  के  बीच ससुर जी बोल पड़े '  ' क्यों रमा ? यह बहू का  घर नहीं ? तरुण  यहाँ क्यों नहीं रह सकता ? आलोक का यह ध्यान  रखती है न  ?
रमा - ' मैं  जो चाहूँगी वही होगा ।आप मत बोलो बीच में।'
 ससुर जी का धैर्य  जवाब दे गया । चीख पड़े, ' अच्छा !सिर्फ तुम्हारा घर  ?  मेरा नहीं ?  बेटों का नहीं ? इसका नहीं ?  सुनो !  यह घर  सिर्फ मेरा है। खून पसीने से बनाया है पर है सबके लिए । '
-- ' बहू ! तरुण को बुला लो। तुम बहन हो अब माँ की तरह  उसका ख्याल रखना - मेरे आलोक का भी' । 
- वे बोलते गए - ' रमा !  बेटी का अरमान था तुम्हें। बेटी सी बहू मिली है। इसका  कोई हक़ नहीं ?  समझ लो, अब तरुण तीसरे बेटे की तरह यहीं रहेगा।
' उनका  स्वर भीगने लगा । नीता ससुर जी का  यह वात्सल्य रूप देखती रह गयी।  उसकी सवाल भरी नज़रें रमा की ओर उठ गयीं। रमा के चेहरे के रंग लगातार बदल रहे थे। फिर एक कोमल भाव ठहर गया। कुछ सोचते हुऐ  सिर झुकाये बोलीं   ' अजय आये तो मुझसे बात करने को कहना। नीता !  खाना लगा दो।'  वे धीमे  कदमों से डाइनिंग टेबल की ओर  बढ़ गयीं। '
================================
                         * किसका घर ? *
                     =============
  मोबाइल की  घंटी बजते ही नीता ने झट से  ऑन किया। बोली '-  हेलो! । आतुर तरुण बोल पड़ा ' दीदी आज सपना देखा, पता है सपने  में माँ पा दिखे । जैसे अस्पताल में अपना इंतज़ार कर रहे हों। आप आ जाओ न यहीं ' ।
 ' नीता ने समझाया '  एक काम करो तुम ही आ जाओ। अब मैं बार बार कैसे आ पाऊँगी? समझ न। 
उसकी हताशा ने चिंता में डाल दिया।सोचा माँ जी से बात कर के देखूँ. वही यहाँ आ जाये?  पर सासु जी और ससुरजी मानेंगे ? उसके प्रेम विवाह  के कारण वे थोड़ी दूरी बनाये रखते हैं। सोचते हुई वह बैठक  में नीता आ गयी। दोनों समाचार सुन रहे थे।  उसे आता देख ससुर जी ने टीवी बंद कर दिया।
 नीता -- ' मम्मी जी तरुण बहुत हताश है।अकेला पड़ गया है।कहीं कुछ गलत न कर बैठे ? क्या वह यहाँ आकर रहसकता है ? उसे  आलोक का साथ मिल जायेगा । .
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं  मम्मीजी -
' नहीं,यहाँ क्यों ? यह कोई धर्मशाला नहीं ?  मेरा घर है यह मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना  तुम हो यहाँ यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती ।  
सुनीता -- ' मम्मीजी!  क्या कह रहे हो ?   इस उम्र में वह बिगड़  सकता है.। माँ बाबा के एक्सीडेंट में जाने के बाद मेरे अलावा उसका  कोई  नहीं। 
 --'  कहा न ,यहाँ नहीं रहेगा वह।  तुम  चाहो तो  जाओ। वरना बहू हो बहू की तरह यहाँ  रहो।  कोई हक़ न जताओ'। 
नीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की ज़िद जीत तो गयी पर  मुझे  न घर मिला न अपनापन।
बहस रोकते  ससुर जी  बोले ' दोनों रुको।  क्या कहती हो साधना ? यह घर बहू का नहीं? तरुण  क्यों नहीं रह सकता ? आलोक का बहू  ध्यान  रखती है न ?
सासु जी - कह दिया ना । जो चाहूँगी वही होगा इस घर में। आप मत बोलो बीच में ' ।
गंभीर स्वभाव के ससुर जी का धैर्य  जवाब दे गया। चीख पड़े, -- ' तुम्हारा घर  ?  मेरा नहीं ? दोनों  बेटों का नहीं ? इसका नहीं?   तो सुनो।  यह घर मेरा है सिर्फ मेरा। खून पसीने से बनाया है, पर सबके लिए । 
बहू !   तरुण को बुला लो । बहन हो अब माँ की तरह उसका ख्याल रखना ।  आलोक का भी।ठीक ?
-  साधना!  -  तुम्हें तो बेटी चाहिए थी ? अब  बेटी सी बहू मिली तो उसकी चिंता समझो। हमारे  बाद यही  सबका ध्यान रखेगी ।  समझ लो। अब तरुण यहीं तीसरे बेटे की तरह रहेगा।  
 सुनीता गंभीर स्वभाव के ससुर जी का यह वात्सल्य रूप  देखती रह गयी।  उसने सवाल भरी नज़रों से साधना को देखा ।
  साधना के चेहरे के रंग बदलते गए।  फिर एक कोमल भाव ठहर गया।धीमे से बोलीं --' हम्म्म्म,  अजय आये तो बताना। खाना लगा दो नीता! धीमे कदमों से वे दोनों को डाइनिंग टेबल की ओर   बढ़ गयीं।
=================================
==================================

क्षितिज के लिए जून।

                       🌸'चैटिंग कि चीटिंग ?'🌸
                             ----------------------
                                            ---महिमा शुक्ला --
          सोमा  मोबाइल पर  इतना व्यस्त रहती  कि सुबह- शाम, खाते- पीते यहाँ तक की  बाथरूम में भी  ले जाती । पढ़ाई कम और चैटिंग में जुटी रहती।।  माँ  से रोज़ बहस भी हो जाती। आज फिर वही -
माँ  -'  बीमारी  है  मोबाइल। स्कूल के लिए देर नहीं हो रही? बस न छूट  जाये .'
  सोमा --ममा ! क्यों पीछे पड़ी हो ? जा रही न ।
माँ -- ' दिन भर चैटिंग ? बेटा ! पढ़ाई कब होगी?  एग्जाम हैं न अगले  माह, आखिर बारहवीं का बोर्ड है  ? 
  -- हाँ !  सुनीता जी ! प्री बोर्ड के लिए ही  गुंजन से  नोट्स शेयर कर रही। अच्छे नंबर न लाऊँ तो कहना ।' -उद्धत सुर में सोमा ने जवाब दिया।
 अक्सर वह माँ का नाम ले लेती  है ।यूँ सुनीता हँस देती पर आज  मौन रही। 
माँ -  ' टाइम लग रहा तो उसके घर जाकर लिख लाओ।दिखाओ  ,थोड़ा तो मैं ही बता दूँगी,' - और हाथ बढ़ा दिया मोबाइल लेने के लिये।
सोमा सकपका गयी। मोबाइल चादर में सरका कर बोली - 'नहीं न। आप  क्या समझोगी ?  शार्ट में है सब।'- 
 और झटके से तैयार होने चली गयी।
     सुनीता-  'हाँ, एम.एस.सी. यूँ ही कर ली मैंने ?   नहीं समझूंगी तुम्हारा कोर्स?  समझती क्या हो '  ? '-बड़बड़ाते  हुये उसका बिस्तर ठीक करने लगी। अचानक चादर के नीचे से मोबाइल  वाइब्रेट करने लगा। मोबाइल निकाल  कर देखा गुंजन के नाम से स्क्रीन झपझपा  रही थी। ऑन किया तो अजीब उल्टी- सीधी  आवाज़ें सुनाई दीं- ' ' ' ओये,.... जान.. जानू.इलू -इलू --.स्कूल तो आओगी न? 
चौँक कर झट से काट  दी कॉल सुनीता ने। देखा उस नाम और नंबर की सारी चैट डिलीटेड थी।  न कोई नोट्स  न  मैसेज दिखे।
सिर्फ अब एक मैसेज -'-वेटिंग -कम सून' ' छप गया ।
 सुनीता की दिल बैठ गया  धोखा सा लगा। ये है पढ़ाई? - कुछ कहूँ अभी  या मोबाइल छुपा दूँ? अगर स्कूल ही न जाये  जिद्दी   सोमा  तो ? ' । 
  दो मिनट में ही स्थिर हो सुनीता ने सोचा कि  अभी कुछ कहना बेकार है।समझाऊँगी तो पुराने विचार  का कह  बहाना बना देगी। इस उम्र में कौन अपनी गलती मानेगा ? उसने जल्दी से  नंबर    डायरी में लिख और मैसेज का स्क्रीनशॉट अपने  नंबर पर ले मोबाइल रख दिया टेबल पर। अब रात को  रोमेश से बात कर तय करेगी क्या -कुछ   करा जाये आगे?
सोमा  तैयार हो कर आयी तो  माँ को अभी भी कमरे में देख  चौँक गयी। उसकी नज़र  टेबल पर रखे मोबाइल पर और सुनीता की खोजती नज़र  सोमा के चेहरे पर  टिक गयीं। उनमें  सिर्फ सवाल थे जवाब नहीं। 
==================================
महिमा शुक्ला 
996,सुदामा नगर, इंदौर 
( म.प्र. )
सम्पर्क --9589024135
(स्वरचित अपर्कशीट अप्रसारित रचना )
==================================

                     🌸चैटिंग और चीटिंग *🌸
                           ---------------------
          सोमा  जब -तब मोबाइल पर व्यस्त रहती। सुबह- शाम,खाते- पीते क्या  बाथरूम में भी। माँ से आज फिर बहस शुरू हो गयी।
माँ   -'  रोज़ की बीमारी यह मोबाइल।  देर नहीं हो रही आज फिर बस के पीछे दौड़ना है ?
  सोमा --माँ! क्यों पीछे पड़ी हो? जा रही  तैयार होने।
माँ -- ' दिन भर चैटिंग ?  पढ़ाई कब होगी?  एग्जाम हैं न अगले  माह, आखिर बारहवीं का बोर्ड है न ? 
सोमा -- हाँ !  सुनीता जी ! इसीलिए तो कृष्णा से चैट कर रही । नोट्स शेयर कर रही। अच्छे नंबर न लाऊँ तो कहना ।' -उद्धत सुर में सोमा ने जवाब दिया। 
अक्सर मज़ाक में वह माँ का नाम ले लेती  है। पर आज माँ  हँसने की जगह मौन रही। 
- हाँ,बेटा जी ! '  तो उसके घर जाकर लिख लाओ। कहाँ रहती है ? दिखाओ  ,थोड़ा तो मैं ही बता दूँगी,' । और हाथ बढ़ा दिया मोबाइल लेने के लिये।
सोमा सकपका गयी। मोबाइल चादर में सरका कर बोली - 'नहीं न । आप  क्या समझोगी ?  शार्ट में है सब।'- 
  आप नाश्ता दे दो -' और तैयार होने चली गयी।
     सुनीता-  'हाँ, एमएससी  यूँ ही कर ली मैंने ?  नहीं समझूंगी  कोर्स ?  समझते क्या हैं आजकल के बच्चे माँ -बाप को'  ? 
बड़बड़ाते  हुऐ वह बिस्तर ठीक करने लगी  कि चादर के नीचे से मोबाइल  वाइब्रेट करने लगा। मोबाइल  उठा  कर देखा.  कृष्णा के नाम से स्क्रीन झपझपा  रही थी। ऑन किया तो अजीब उल्टी- सीधी  आवाज़ें सुनाई दीं- ' ' ' ओये,...इलू इलू . जान.. जानू.। .स्कूल तो आओगी न? 
चौँक कर झट से काट  दी कॉल सुनीता ने।  घबरा गयी। देखा, उस नाम और नंबर की सारी चैट डिलीटेड थी।  न नोट्स  न  मैसेज दिखे।
सिर्फ अब एक मैसेज -'-वेटिंग -कम सून' '- छप गया गया।
 सुनीता की दिल बैठ गया -क्या होगा अब ? कुछ कहूँ अभी ? या मोबाइल छुपा दूँ ? फिर तो स्कूल ही नहीं जायेगी। जिद्दी   सोमा। 
  दो मिनट में स्थिर हो सुनीता ने तय किया ,अभी कुछ कहना बेकार है। समझाऊँगी तो बहाना बना देगी।  अपनी गलती  नहीं मानेगी।  जल्दी से  नंबर   अपनी डायरी में लिख लिया। मैसेज का स्क्रीनशॉट ले मोबाइल  रख दिया टेबल पर। शाम को अब रोमेश से बात करके  तय  करना होगा  आगे।  
  तैयार हो कर आयी सोमा तो माँ को अभी भी कमरे में देख  चौँक गयी। उसकी नज़रें बदली जगह पर रखे मोबाइल पर और सुनीता की खोजती नज़र  सोमा के चेहरे पर  टिक गयीं । जिनमें  सिर्फ सवाल थे जवाब नहीं। 
================================

_____________________________________

चैटिंग*🌸 । -------------- जब देखो तब रोमा मोबाइल पर व्यस्त रहती। यहॉँ तक कि खाते समय भी। माँ सुनीता परेशान हो जाती, न आँखों का ध्यान न समय का। आज तो हद हो गयी स्कूल जाने का समय हो गया और अभी तक रोमा तैयार ही नहीं हुईं। चिल्ला पड़ी अब तो--- ' दिन भर चैटिंग करती रहती हो ? बेटा ! पढ़ाई नहीं करना ? एग्जाम हैं न अगले माह, आखिर बारहवीं का बोर्ड है न? -- अरे माँ! उसी के लिये तो कृष्णा से चैट कर रही देखो, नोट्स शेयर कर रही।उद्धत सुर में सोमा ने जवाब दिया। --- स्कूल नहीं जाना ? इतना टाइम लग रहा तो उस के घर जाकर लिख लाओ ? दिखाओ ? थोड़ा तो मैं ही बता दूँगी।' सुनीता ने हाथ बढ़ा दिया मोबाइल लेने के लिये।रोमा सकपका गयी, - ' नहीं न। आपको क्या समझ आएगा ? शार्ट में है सब।'- फिर तैयार होने चली गयी। सुनीता बिस्तर ठीक करने लगी। लगा मोबाइल चादर के नीचे से वाइब्रेट कर रहा था। मोबाइल उठा कर देखा श्री कृष्णा के नाम से स्क्रीन झपझप कर रही । ऑन किया तो अजीब उल्टी- सीधी कराहटें सुनाई दीं- ' ' ' माय लव, इलू इलू की..'। चौँक कर झट से काट दी कॉल। देखा उस नाम और नं की सारी चैट डिलीट थी। न नोट्स दिखे न कुछ और। सुनीता की दिल बैठ गया। अब ? रोमा से अभी कुछ कहना बेकार है। इस उम्र में सुनेगी - मानेगी नहीं । जल्दी से नंबर डायरी में लिख लिया। अब रात को रोमेश से बात करके ही तय करेगी,आगे क्या कैसे?

Monday, May 25, 2026

पढ़ाई का बोझ --

      राजन --'पापा, टीचर रोज़ टोकतीं हैं। मेरी                                किताबें?  कब चलोगे बाजार ?'
    रमेश - 'बेटा चलेंगे जल्दी ही  ? '
 वे मन में सोच रहे, इतनी जल्दी रिजल्ट आया ही क्यों?
  फिर वही खर्चे फीस, किताब,कॉपी - बैग आदि के। 
   रमेश आज कल की कह उसे टाल रहे थे । उन्हें              इंतज़ार था पहली तारीख पर  तनख्वाह मिलने का।        राजन ने आठवीं क्लास में अच्छी ग्रेड पायी थी । रिजल्ट के साथ नवीं क्लास की  किताबों -कॉपीज़, रेफ. बुक्स और अन्य जरूरी सामान की सूची  और एक स्लिप  भी मिली थी। उसमें दुकान का नाम और पता भी था।
 आज वह बाजार जा रहा था  पिता  के साथ। खुशी से उछलता- भागता ,भीड़ में जगह बनाता पापा को खीँचता ले जा रहा था। एक बड़ी सी दुकान पर वह  ठिठक गया 'पापा यहीं से लेना है ? देखो यहाँ बैग्स भी हैं।' 
रमेश ने सिर हिला दिया और लिस्ट काउंटर पर देकर किताबें और कॉपी देने कहा।  जब तक किताबें आतीं - राजन रंग -बिरंगे बैग्स टटोलता रहा। कभी काला कभी भूरा और कभी लाल। अंत में उसने लाल बैग पसंद किया।
 दुकानदार ने किताब -कॉपी का अलग अलग बिल बना कर रमेश को थमा दिया. ओह! इतनी सारी ? हज़ारों का बिल देख कर वे चौँक गए। 
-- पूछा - इतना? सब  लेना होगा, अभी  ? 
-- हाँ ! साहब, पूरी हैं ये।इस स्कूल  का सारा काम यहीं से होता है। इसमें रेफेरेंस बुक्स भी हैं,और साल भर का दूसरा  जरुरी सामान भी। 
 रमेश क्या कहते.? राजन के दमकते  चेहरे पर नज़र  गयी। फिर  चुपचाप भगतान कर दिया । लेकिन इतना वज़न ?  कैसे ले जाएँगें ? कोशिश की पर वे  उठा नहीं सके। 
दुकानदार ने कहा- ' आप  रहने दें . हम पार्किंग तक भेज देंगे। आप आगे चलिए।
  रमेश ने आगे बढ़ते हुए बोले -- ठीक,  भेजिए फिर।
  एक ठेले पर  बहुत से पैकेटस में किताबें आदि सामान रख कर उनका सेवक पट्टा  बाँधे  तैयार था। वे आगे- आगे और ठेला पीछे -पीछे।  सोचने लगे कहाँ हमारे समय में तो एक माँ के बनाये कपड़े के थैले में ही सब किताब कॉपी आ जातीं थीं। और अब  कुली सा बैग, वज़न इतना  ? इतनी सब बच्चे पढ़ेंगे कब और कैसे?  
     पीछे मुड़ कर देखा तो आँखों में अंधेरा  छा गया । उन्हें लगा टाई लगाए  यूनिफार्म पहने राजन ही  ठेला खींच रहा है। 15- 20 किलो के वज़न का  बैग लादे चला आ रहा । बोझ घसीटता बाल मज़दूर सा।
==================================
 

Monday, November 4, 2024

तरु --

*बाप*
------------
     अक्षत पांडे, नॉएडा 
------------------------------
 *
बलिश्त भर के थे तुम जब पहली बार देखा था 
एक डोर से जुड़े थे अपनी माँ से जिसका कोई सिरा न था,
आँख मेरी गीली थी,न जाने कहाँ से ये नूर उतरा था 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है 

नहला -धुला के पौंछ के तुमको, मेरी गोद में रख दिया गया 
अपने आप ही मेरे हाथ, एक l शेप का पालना बन गया 
एक टुकड़ा मेरी शख्सियत का आज मेरी गोद में सोता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है। 

नानी दादी  मौसी -आया से तुम घिरे रहते थे 
सब अपना हक़ जताते थे,
एक पल पकड़ने के लिये तुमको सब आपस में लड़ जाते थे 
जो दूर खडे हुए एक मर्द की एक्टिंग करते  सोचता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है

वो फुदकिया सा इधर उधर बस, घर को नापे रहता है 
कभी चादर से, कभी बिस्तर के नीचे से जुगनू सा चमकता है 
माँ जब शिकायत तेरी करती ,मैं धीरे से कह देता हूँ, जाने दो अभी छोटा है। 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है,

पहली चोट तुम्हारी वो पहला खूँ तुम्हारा मेरी आँखों में उतर आया था 
उधर ज़ख्म भरे तुम्हारे और इधर मैंने दुनिया को माफ कर दिया 
जब दर्द हो तुम्हें, कुछ अंदर तक टूटता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है 

बड़े हो रहे हो अब, एक दोस्त बनता नज़र आता है मेरा
न कभी तुम जवाँ होना न मैं कभी उम्र दराज़ 
ताली मारते -साइकिल चलाते  और मम्मी की टांग  खिंचते  गुज़र  जाएगी 
लोगों को बताना फिर कि ऐसा भी बाप होता है।
===============================

Tuesday, September 10, 2024

व्यवहारिक शिक्षा

       किताबी शिक्षा और व्यवहारिक शिक्षा में अंतर हैं। किताबी   ज्ञान एक तरह से औपचारिक ही है। जीवन के लिये कैसी शिक्षा  उपयोगी  होगी?  यह नहीं देखा जाता।    शिक्षा व्यवस्था में परम्परागत विषय पढ़ाये जातें हैं। एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग इनसे जीवन नहीं निकाल पा रहा। लिखित रूप में क्या विषय है  ?   काम कैसे  करना चाहिए ? आदि नहीं सिखाया जाता।। वहीं व्यावसायिक शिक्षा में हमें व्यावहारिक तौर   पर सिखाया जाता है क्या   काम /जॉब कैसे करना है?किताबी शिक्षा से  ज्ञान बढ़ता है. कोर्स की  औपचारिक डिग्री जरूर मिलती है। लेकिन व्यवहारिक शिक्षा से हम सीखते हैं कि कैसे किसी काम को असली जीवन में  कैसे लागू करना है। आने वाली स्थितियों में कैसे संतुलन करना है। काम करने की कुशलता और  उसे स्तरीय बनाना अलग बात है। इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आस -पास के माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता  है। स्कूल-  कॉलेज आज भी डिग्री ही दे रहे हैं। बाकी ओर उनका ध्यान कम ही है। इसलिए प्रशिक्षण और कोचिंग संस्थान बहुत बढ़ रहे हैं। मेडिकल,इंजीनियरिंग और विज्ञान के विषय में भी प्रैक्टिकल  जरूर होते हैं। फिर भी वे रोज़गार और बाह्य संस्थानों और रोज़गार के उपयुक्त कम ही हैं। स्पष्ट है कि उद्योगों के अनुरूप जॉब  और अभ्यर्थी नहीं मिल रहे। आज की प्रतिद्वन्दी  समाज और  माहौल में यह सबऔर अधिक संवेदनशील  होता जा रहा है।प्रशिक्षण, जॉब, कुशलता और सफलता पाना कठिन हो रहे है। इसलिए ही उनमें मानसिक और सामाजिक विचलन भी दिख रहे हैं।  व्यावहारिक शिक्षा की जरूरत समझी  तो जाती है। पर इसके अवसर आज भी कम और महेंगे भी।  सर्वसुलभ  तो हैं भी नहीं। ऐसे में संभावनाएं अंनत हैं। इस और अकादमिक क्षेत्र,सरकार, उद्योगों और संस्थानों के नियोजित प्रयास जरुरी हैं पर कब कौन कैसे करेगा? यह नहीं कहा जा सकता।

औपचारिक शिक्षा व्यवस्था अब कह सकते हैं मज़बूत होने की बजाय सक्षम नहीं कही जा सकती।  निजी क्षेत्र  में शिक्षा  बहुत  महंगी, सरकारी - अक्षम और बाकी एक बड़े वर्ग के लिये उपयुक्त नहीं रही। शिक्षा नीति बनती है पर उसका क्रियान्वयन का हाल ठीक नहीं। पूरे देश में 20-30%  ही उपयुक्त हैं बाकी सब अनियमित, अक्षम और अनुपयुक्त। ऐसे में निराश, बेरोज़गार , अक्षम  - श्रम शक्ति ही बढ़ चुकी है। देखा जाए तो आमूलचूल   नयी व्यवस्था की जरुरत है  हर स्तर पर।  प्राइमरी, स्नातक और फिर तकनीक विषयों की शिक्षा के लिये।  समाज में स्थापित होने  के लिये  शिक्षा के साथ अन्य नैतिक - सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी जरुरी है।  इंसान मशीन की तरह भी काम नहीं कर सकता।   मानवीय व्यवहार का दृष्टिकोण आज बहुत जरुरी है। इन दोनों को साथ जोड़ कर ही सर्वाँगींण शिक्षा दी जाये वही देश के लिये उपयुक्त होगा।

===================================

है