Monday, November 4, 2024

तरु --

*बाप*
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     अक्षत पांडे, नॉएडा 
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बलिश्त भर के थे तुम जब पहली बार देखा था 
एक डोर से जुड़े थे अपनी माँ से जिसका कोई सिरा न था,
आँख मेरी गीली थी,न जाने कहाँ से ये नूर उतरा था 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है 

नहला -धुला के पौंछ के तुमको, मेरी गोद में रख दिया गया 
अपने आप ही मेरे हाथ, एक l शेप का पालना बन गया 
एक टुकड़ा मेरी शख्सियत का आज मेरी गोद में सोता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है। 

नानी दादी  मौसी -आया से तुम घिरे रहते थे 
सब अपना हक़ जताते थे,
एक पल पकड़ने के लिये तुमको सब आपस में लड़ जाते थे 
जो दूर खडे हुए एक मर्द की एक्टिंग करते  सोचता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है

वो फुदकिया सा इधर उधर बस, घर को नापे रहता है 
कभी चादर से, कभी बिस्तर के नीचे से जुगनू सा चमकता है 
माँ जब शिकायत तेरी करती ,मैं धीरे से कह देता हूँ, जाने दो अभी छोटा है। 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है,

पहली चोट तुम्हारी वो पहला खूँ तुम्हारा मेरी आँखों में उतर आया था 
उधर ज़ख्म भरे तुम्हारे और इधर मैंने दुनिया को माफ कर दिया 
जब दर्द हो तुम्हें, कुछ अंदर तक टूटता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है 

बड़े हो रहे हो अब, एक दोस्त बनता नज़र आता है मेरा
न कभी तुम जवाँ होना न मैं कभी उम्र दराज़ 
ताली मारते -साइकिल चलाते  और मम्मी की टांग  खिंचते  गुज़र  जाएगी 
लोगों को बताना फिर कि ऐसा भी बाप होता है।
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Tuesday, September 10, 2024

व्यवहारिक शिक्षा

       किताबी शिक्षा और व्यवहारिक शिक्षा में अंतर हैं। किताबी   ज्ञान एक तरह से औपचारिक ही है। जीवन के लिये कैसी शिक्षा  उपयोगी  होगी?  यह नहीं देखा जाता।    शिक्षा व्यवस्था में परम्परागत विषय पढ़ाये जातें हैं। एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग इनसे जीवन नहीं निकाल पा रहा। लिखित रूप में क्या विषय है  ?   काम कैसे  करना चाहिए ? आदि नहीं सिखाया जाता।। वहीं व्यावसायिक शिक्षा में हमें व्यावहारिक तौर   पर सिखाया जाता है क्या   काम /जॉब कैसे करना है?किताबी शिक्षा से  ज्ञान बढ़ता है. कोर्स की  औपचारिक डिग्री जरूर मिलती है। लेकिन व्यवहारिक शिक्षा से हम सीखते हैं कि कैसे किसी काम को असली जीवन में  कैसे लागू करना है। आने वाली स्थितियों में कैसे संतुलन करना है। काम करने की कुशलता और  उसे स्तरीय बनाना अलग बात है। इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आस -पास के माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता  है। स्कूल-  कॉलेज आज भी डिग्री ही दे रहे हैं। बाकी ओर उनका ध्यान कम ही है। इसलिए प्रशिक्षण और कोचिंग संस्थान बहुत बढ़ रहे हैं। मेडिकल,इंजीनियरिंग और विज्ञान के विषय में भी प्रैक्टिकल  जरूर होते हैं। फिर भी वे रोज़गार और बाह्य संस्थानों और रोज़गार के उपयुक्त कम ही हैं। स्पष्ट है कि उद्योगों के अनुरूप जॉब  और अभ्यर्थी नहीं मिल रहे। आज की प्रतिद्वन्दी  समाज और  माहौल में यह सबऔर अधिक संवेदनशील  होता जा रहा है।प्रशिक्षण, जॉब, कुशलता और सफलता पाना कठिन हो रहे है। इसलिए ही उनमें मानसिक और सामाजिक विचलन भी दिख रहे हैं।  व्यावहारिक शिक्षा की जरूरत समझी  तो जाती है। पर इसके अवसर आज भी कम और महेंगे भी।  सर्वसुलभ  तो हैं भी नहीं। ऐसे में संभावनाएं अंनत हैं। इस और अकादमिक क्षेत्र,सरकार, उद्योगों और संस्थानों के नियोजित प्रयास जरुरी हैं पर कब कौन कैसे करेगा? यह नहीं कहा जा सकता।

औपचारिक शिक्षा व्यवस्था अब कह सकते हैं मज़बूत होने की बजाय सक्षम नहीं कही जा सकती।  निजी क्षेत्र  में शिक्षा  बहुत  महंगी, सरकारी - अक्षम और बाकी एक बड़े वर्ग के लिये उपयुक्त नहीं रही। शिक्षा नीति बनती है पर उसका क्रियान्वयन का हाल ठीक नहीं। पूरे देश में 20-30%  ही उपयुक्त हैं बाकी सब अनियमित, अक्षम और अनुपयुक्त। ऐसे में निराश, बेरोज़गार , अक्षम  - श्रम शक्ति ही बढ़ चुकी है। देखा जाए तो आमूलचूल   नयी व्यवस्था की जरुरत है  हर स्तर पर।  प्राइमरी, स्नातक और फिर तकनीक विषयों की शिक्षा के लिये।  समाज में स्थापित होने  के लिये  शिक्षा के साथ अन्य नैतिक - सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी जरुरी है।  इंसान मशीन की तरह भी काम नहीं कर सकता।   मानवीय व्यवहार का दृष्टिकोण आज बहुत जरुरी है। इन दोनों को साथ जोड़ कर ही सर्वाँगींण शिक्षा दी जाये वही देश के लिये उपयुक्त होगा।

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है 



Monday, September 9, 2024

हिंदी भाषा

🌸हिंदी दिवस🌸
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        🌸 क्षणिकाएँ 🌸
 '1-अंग्रेजी चाहे  जितनी पढेँ, ज्ञान गुण भले  बढ़ जाये 
प्यासा मन  तभी तृप्त हो जब निज भाषा बोली जाये,
सरल सहज संवाद से जो जन - जन को जोड़े 
चारों दिशाओं में प्रसारित हो हर बोली से गले मिले 
  यही हमारी प्रिय हिंदी  है -प्रिय मातृ भाषा है।
  आज  का ही केवल खास दिवस नहीं है इसका 
     प्रतिदिन ही मंगल  पर्व- समारोह  है   ।==================================
 2-    
       अपनी  भाषा -  हिंदी  नदी की धारा सी है  
        न जाने कितनी बोली,भाषाओं को 
            अपने अंतर में समाती आयी है 
              नये शब्द नये रुप- स्वरूप ले
               यह आगे बढ़ती  ही जाती है 
           रोक सकी न कोई  और भाषा 
          इसके तेज  प्रवाह  प्रभाव को 
       इसीलिए देश की भाषा हिंदी 
     सब बोली और भाषाओं की सरमौर है ।
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  3- 🌸 "हिंदी दिवस "🌸
             -- क्षणिका --
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  3 *  कोरे पन्ने पर जब  जब भी कलम चली 
     प्राण प्रतिष्ठित हिंदी भाषा के अक्षर उभर आते हैं 
    जब भी  कुछ सोचा और कुछ कहना चाहा
     मनो भाव मेरे सब  शब्दों में  ढल जाते हैं 
     सुःख दुख -पीड़ा -परपीड़ा एक कविता में ढल गए 
       योग-संयोग - वियोग  के पल भी 
       कुछ कहानियों में   रच  गए 
      पहली कुहूक और अंतिम  बोल अपनी बोली में 
       जीवन -मरण का  जीवंत कथानक कह गए  । 
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 4-- फिर आ गया है हिंदी दिवस 
      पर्व  मनेगा बंद कमरों और समारोहों में 
      टाई सूट पहन कर हैप्पी हिंदी दिवस कहेँगे 
      कसमे वादे किये जायेंगे बस संकल्प न पूरे होंगे 
      कागज़ पर लिखे जायेंगे आदेश 
      सरकने लगेंगी  धीरे धीरे फ़ाइलें भी 
      जो कभी न पहुंचेंगी मंज़िल पर 
       न जाने  ऐसे कितने दिन और साल बीते 
      किसी को याद न आयी राष्ट्रभाषा की 
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     अंग्रेजी स्कूल में पढ़ लिख कर 
     बने डॉक्टर और इंजीनियर 
     हुईं मशक़्कत अब रोज़ी रोटी की
     और  हुआ सामना अनपढ़ और गरीब 
        बेहाल मरीज़ों और मज़दूरों से 
     अंग्रेजी का दिमाग़ सोचे क्या  और कैसे बोले ?
       गले में अटक गयी अंग्रेजी कंकड सी 
        ज़ुबान भी कुछ ऐंठ गयी 
        रोज़ी रोटी की चिंता में 
        हिंदी   ही तारणहार बनी 
       पूछे हाल -चाल  अपनी बोली में 
        बिन हिंदी बोले   क्या काम  चले?
        
         
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अक्षत पांडे

कुछ ज्यादा नहीं हुआ है, 
 बस  वक़्त की सिलाई उधड़ गयी है '
कि  जिसको  कस के बांधा था, 
कि जिसको  बांध  के सिल दिया था. 
सुबह, दोपहर और  शाम के  धागों से. 
बड़ा अजीब था वो कारखाना,  
कि  जिसमें धागों के रंग कोई भी हों.
सारे  दिन एक से निकलते   थे. 
अब के दिन जैसे नर्म  सफ़ेद चादर,
जिसको नींद आये तो ओढ़ लेता हूँ. 
या किसो भी रंग में रंग लेता हूँ. 
अब भूख भी वक़्त देख कर नहीं लगती .. 
कि जैसे वक़्त से आज़ाद हो गया हूँ. 
और घड़ियों में जंग लगने लगी है. 
कुछ अश्वतथामा  जैसी कैफियत है, 
कि दुनिया  खत्म हुई  हुई तो.. 
इस कैद से बरी हो जाऊँगा... 



Wednesday, March 13, 2024

       🪅 होली की मनुहार पाती🪅
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सरोकार साझा मंच की मार्च माह की बैठक  होली पर्व पर आयोजित है। आप इस पर्व पर लोकगीत,कविता ,गीत, नृत्य,लघुकथा या संस्मरण किसी भी विधा में रचना प्रस्तुत करने के लिये  स्वतंत्र है। मैं  आप सभी को मेरे  निवास स्थान पर आमंत्रित कर रही हूँ । आशा है कि+91 94068 26868आप  मेरे स्नेह का मान रख अवश्य पधारेंगे। ज्यादा लोग आएंगे तो होली का पर्व उत्साह से मना लेंगे। नाम जल्द भेजने का कष्ट करे  ताकि व्यस्था की जा सके l
स्थान -/निवास --  113, सुभाष नगर, परदेशीपुरा, इंदौर ।
दिनांक-- सोमवार, 18.3.20024 
समय --  3:30 pm  अपराह्न।
सम्पर्क ---+ 91- 94068 26868
आशा मुंशी
आयोजक
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holi snrs maran

होली आये इससे पहले ही बचपन जाग उठता है। दादी के साथ गांव में होली मनाना  आज भी याद आता है। गांव में सबसे पहले हमारा घर था दादी बड़ी बुजुर्ग,इसलिए पहली फाग वहीं बड़े चबूतरे पर शुरू होती। 10 दिन पहले से ही  ढोलक, झाँझ - मंजीरे  बजने लगते। पहले फाग -होरी  गाते फिर मिठाई,ठंडाई और गुलाल की बारी आती। गाँव के सभी बाशिंदे  अगले दिन से हर घर  में बैठक लगाते। जहाँ  शोक के बाद पहली होली मानती वहाँ रंग डाला जाता था।  इसमें बच्चे शामिल नहीं  किये जाते तो हम छत पर बैठ कर चुपके से देखा करते।  ठंडाई पीने के बाद उनके गाने- बजाने के शोर  और हास्य -व्यंग्य और तेज़ हो जाते ।  भाँग के कुछ अंश का असर जो होता था उसमें। हम बच्चों के लिए वह आयोजन आश्चर्य और  आकर्षण का होता। 
   -- फिर नैनीताल की होली विशेष थी। 5-6 साल की उम्र में जब सब बच्चे स्वांग - बहुरुपिये बन कर घर - घर चंदा के पैसे माँगने जाते।  मुझे अंग्रेज़ी जेंटलमैन का रूप दिया जाता। कोट,पेंट और हेट पहना कर। सबसे छोटी होने के कारण मुझे अलग से  मिलते थे।  यूँ चार आने से ज्यादा कोई देता नहीं था।  तब 2-3 रु. भी बड़ी रकम लगती थी। जिसका  होली का प्रसाद लिया जाता।  और कुछ बड़े हुए तो जयपुर में होली मनी  ढंग से।  होली वह भी बिना रोक टोक के। हम महिलाओं के  ग्रुप में शामिल होकर रंगते-  रँगाते। आस -पास के घरों में -दोस्तों के यहां खूब गाते-  बजाते,खाते पीते, फ़िल्मी  गानों पर अंत्याक्षरी और मस्ती में बेतुके डांस भी  इतना रंगे जाते कि हफ्ते भर रंग छुड़ाना पड़ता।  गुझिये -  मठरी छुपा छुपा कर  खाते । दो कनस्तर  भर कर माँ  जो बनाती थीं।  तब मिलने -जुलने का रिवाज़ था। परिचितों के कुछ घर आना -जाना चलता। होली आये इससे पहले ही बचपन जाग उठता है। दादी के साथ गांव में होली मनाना आज भी याद अता है। सबसे पहले हमारा ही बड़े चबूतरे पर फाग जुड़ती। 10 दिन पहले से ही ढोलक, झाँझ मंजीरे बजते पहले फाग -होरी फिर मिठाई,ठंडाई और गुलाल की बारी आती। गांव के सभी बाशिंदे अगले दिन से हर घर में बैठक लगाते। बच्चे शामिल नहीं किये जाते तो हम छत पर बैठ कर चुपके से देखा करते। ठंडाई का असर उनके गाने बजाने के शोर को और तेज़ कर देता। भाँग के अंश का असर जो होता उसमें।
 फिर नैनीताल की होली याद आती 5-6 साल की उम्र में जब सब बच्चे स्वांग - बहुरुपिये बन कर घर घर चंदा पैसे मांगने जाते। मुझे अंग्रेज़ी जेंटलमैन का रूप दिया जाता। कोट पेंट और हेट पहना कर। सबसे छोटी होने के कारण मुख्य हिंसबसे ज्यादा पैसे मिलते थे, यूँ चार आने से ज्यादा कोई देता नहीं था। फिर जयपुर में बड़े होने पर ढंग से होली खिली बिना रोक टेक के। कजुब रंगते रँ गाते आस पास के घरों में -दोस्तों के यहां गाते बजाते। हफ्ते भर रंग छुड़ाते रहते और गुझिये खाते । दो कनस्तर के माँ जो बनाती थीं। तब मिलने जुलने का रिवाज़ थे जो 10 दिन चलते रहते।
-- शादी के बाद पहली होली पर तबियत के कारण मनाने जैसा माहौल नहीं था। उदास मन से बनाया - खाया ही था कि चचेरे देवर और ननद आ गये  पर संकोच में बैठे रहे । मैं भी अपने कमरे में बैठी रही । अचानक जोर से धमक उठी,देवर ने धाड से दरवाज़े पर पैर मारा और कमरे में आकर पीछे से ग़ुलाल का टीका लगाने का   कह कर बालों और चेहरे पर लगा दिया। फिर क्या था बस होली का शगुन और रंग शुरू हो गया। आज भी दरवाज़े के टूटे  हिस्से पर दूसरा फट्टा लगा है या द दिलाता है उस  धाड़ की आवाज़ और  दरवाजे की हालत और सास जी की डांट की । 
ऐसे ही दूसरी होली भी यादगार मनी। पड़ोस में रिश्तेदार आंटी रहने लगीं थीं।उनके यहाँ यू.पी का माहौल था। अकेला देख कर आग्रह से बुलाया तो वहीं चले गये होली पर। रंग खेल कर उन्होंने ठंडाई दी। मना भी किया पर वे पिला कर ही मानी।  बोलीं भाँग है ही नहीं सिर्फ ठंडाई है। पियो जी भर के कुछ नहीं होगा। आशंका बानी थी  पर ले  ली गर्मी के कारण।डेढ़ गिलास भर पी ली। 2 घंटे बाद  घर आये तो सर चकराने लगा। -अजीब सी नीन्द आने  लगी। जैसे तैसे नहाना हुआ फिर जो सोये तो रात 9 बजे उठे। सपने ऐसे देखे जैसे तैर रहें हों। कभी लगता उड़ रही आसमान में। समझ आ गया था कि भाँग का ही असर होगा। अगले दिन शिकायत  मु स्कुरा कर बोलीं बुरा न मानो होली है। अरे,बस जरा सी थी बस,
  -- आज 10 बरस से होली नहीं खेली। अब न वह माहौल रहा, न मिलना जुलना। सब अपने में केंद्रित। सिर्फ यादें हैं होली की। ये उम्र का असर हो या हालात का। जो भी हो अब वह होली रही नहीं। आंनद रस सौहार्द - प्रसन्नता की कमी दिखाई देती है ।
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   2 gilasजो 10 दिन चलते  रहते।
-- शादी के बाद पहली होली  तबियत के कारण  मानाने जैसा माहौल नहीं था।  उदास मन से बनाया खाया  ही था कि चचेरे देवर और ननद आये भी पर मूड देख कर संकोच में बैठे रहे।मैं भी अपने कमरे में बैठी थी। अचानक जोर से धमकी उठी, उसने धाड से दरवाज़े पर पैर मारा और कमरे में आकर पीछे से ग़ुलाल सर मुंह पर लगा दिया। फिर क्या था बस होली का शगुन और रंग शुरू हो गया। आज भी दरवाज़े में टूटा  हिस्से पर दूसरा फट्टा याद दिलाता है  धाड़ कि आवाज़ और टूटा दर्वाज़े  की हालात और सास जी की डांट की  । 
ऐसे ही दूसरी होली भी यादगार  मनी। पड़ोस  में रिश्तेदार आंटी के यहाँ यू पी का माहौल  था। अकेला देख कर आग्रह से बुलाया तो वही चले गये होली पर। रंग खेल कर उन्होंने ठंडाई दी। मना  भी किया पर वे पीला कर ही मानी।  खुथ बोल दिया की भाँग है ही नहीं सिर्फ ठंडाई है। गर्मी थी तो गिलास भर पी ली। 2 घंटे बाद घर आकर सर  चकराने लगा -अजीब सी नींद आने लगी। जैसी तैसे नहाना हुआ फिर जो सोये तो रात 9 बजे उठे।  ऐसे ऐसे सपने देखे जैसी तैर रहें हों कभी लगता उड़ रहें हो आसमान में।  समझ आ गया था कि भाँग का ही असर  होगा। अगले दिन शिकायत कि तो मुस्कुरा कर बोलीं बुरा ँ मानो होली है। अरे बस जरा सी थी बस
  -- आज 10 बरस से होली नहीं खेली न वह माहौल रहा, न मिलना जुलना सब अपने में केंद्रित सिर्फ  यादें हैं होली की। ये उम्र का असर हो या  त्यौहार  का। जो भी अब वह होली रही नहीं। आंनद  रस  सौहार्द - प्रसन्नता की कमी दिखाई देती है।
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   2 gilas

Tuesday, March 12, 2024

शादी

पिछले दिनों एक सोशल संदेश में पढ़ने में आया कि जैन समाज के एक निर्णय अनुसार जिन परिवारों में 6 से अधिक व्यंजन परोसे जाएंगे उस शादी दुल्हा -दुल्हन को केवल आशीर्वाद दिया जाएगा, खाया नहीं जाएगा। अग्रवाल समाज ने भी ऐसा ही निर्णय लिया है। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि शादी के कार्ड नहीं छपवाकर केवल वाट्स एप और फोन के जरिए ही निमंत्रण सूचना प्रेषित की जाएगी।ये दोनों समाज आर्थिक दृष्टि से सक्षम होने के बावजूद शादी- विवाह में फिजुलखर्ची रोकने के लिए ऐसा निर्णय ले रहे हैं तो जो लोग कर्ज लेकर शादी - विवाह, मुंडन, नुक्ता , घाटा आदि पर फिजूलखर्ची करते हैं क्या उन्हें इस तरह के निर्णय लेने आगे नहीं आना चाहिए। यही ही इस सप्ताह के विमर्श का विषय शादी में धन की बर्बादी आखिर कब रूकेगी। इस पर आपके मौलिक विचार बुधवार शाम तक आमंत्रित हैं।‌


40% धन 1%अमीरों के pass
50 % 9न के पास 3% संपत्ति
====2500 गुना अंतर