Tuesday, June 9, 2026

क्षितिज comp.

 ' बदलाव '
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    एक फोन कॉल ने सुनीता को चिंता में डाल दिया । अजय ने पूछा -  'क्या हुआ किसका फोन है ' ?
 --तरुण का। माँ -बाबा के जाने के बाद अकेला हो गया है। बहुत उदास और  हताश  है। पूछ रहा - कब आओगी?
 अजय ने तुरंत  कहा --' बुला लो यहीं. तुम कब तक रहोगी ?  उसका मन लग जायेगा यहाँ । 
सुनीता --  सही,  पर कैसे?मम्मी जी - पापा जी नहीं मानेंगें । 
अजय- मन जायेंगे, तुम बात कर लो। भाई है तुम्हारा। हम साथ नहीं देंगे तो बिखर जायेगा । रहे- पढ़े जब तक उसका मन हो ।
सुनीता  -- उम्मीद कम है मुझे ।पर दोनों मान जायें तो अच्छा होगा।  ससुराल है सो वह भी  कम  आता है।
अजय - तुम बात करो, तैयार होकर आता हूँ मैं भी।
 वह  कमरे से बाहर  आयी तो देखा  बैठक में  सास - ससुर टीवी पर समाचार देख रहे थे।   उसे आता देख ससुर जी ने टीवी बँद कर दिया। सुनीता ने धीरे से बात शुरू की।
-:'ममी जी! तरुण बहुत परेशान  है। अकेला  है। आज बात हुई तो बहुत उदास  था। ठीक से पढ़ नहीं पा रहा है। अगर यहाँ आ जाए तो उसे  हमारा मिल जायेग और आलोक के साथ कॉलेज भी।  मुझे उसकी चिंता नहीं रहेगी'.
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं मम्मी जी -
' क्यों? यहाँ कैसे? उसका घर है न ?  बाई रख ले वहाँ । यह कोई धर्मशाला है ?  तुमने सोचा भी कैसे?  मेरा घर है यह मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना  तुम हो यहाँ, यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती ।  सुनीता -- ' मम्मीजी!  क्या बोल रहे हो आप ?   इस उम्र में वह बिगड़  सकता है.मेरे अलावा है कौन उसका ? --'  कह दिया न  इस  घर में  नहीं रहेगा वह।  तुम  चाहो तो रहो वहाँ ।  बहू हो बहू की तरह  रहो।  कोई हक़ न जताओ'। 
सुनीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की ज़िद जीत तो गयी पर  मुझे  न घर दे सकी न अपनापन।
बहस  आगे बढ़ती  पर बीच में ससुर जी  बोल पड़े 
'  सुनीता! रुको । और तुम क्या कहती हो साधना ? बहू का यह घर नहीं? तरुण  क्यों नहीं रह सकता ?आलोक -तुम्हारे छोटे  का ये पूरा ध्यान  रखती है न  ?
सासु जी - कहा न ?  जो चाहूँगी वही होगा घर में। आप मत बोलो बीच में ' ।
 आर्मी से रिटायर्ड ससुर जी का धैर्य  जवाब दे गया। चीख पड़े, ' अच्छा ! तुम्हारा घर है ?  मेरा नहीं ? दोनों  बेटों का नहीं ? इसका नहीं? फिर सुनो।  यह घर मेरा है सिर्फ मेरा। खून पसीने से बनाया है, पर सबके लिए । 
बहू !   तरुण को बुला लो। घुट -घुट के क्यों रहेगा ? । बहन हो अब माँ की तरह  उसका ख्याल रखना । मेरे आलोक के साथ । ठीक ?
-  और साधना! ध्यान रखना। अब बहू से कुछ नहीं कहना  ।  क्या हुआ तुमको ? तुम्हें तो बेटी चाहिए थी ? अब  बेटी सी बहू मिली तो कैसी बात कर रही हो ? हमारे  बाद  बहू को ही तो सबका ध्यान रखना है।  समझ लो, तरुण तीसरे बेटे की तरह यहीं रहेगा।  
 सुनीता कठोर अनुशासन वाले ससुर जी का यह वात्सल्य रूप देख  उन्हें देखती रह गयी।  उसकी सवाल भरी नज़रें साधना की ओर उठ गयीं ? 
  साधना के चेहरे के रंग बदल रहे थे, और फिर एक कोमल भाव ठहर गया। उन्होंने   बाई को आवाज दी,' रमा खाना लगा दो, अजय आओ बाहर। '।  फिर दोनों को डाइनिंग टेबल की ओर चलने का इशारा कर  दिया। 
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बदलाव '
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    एक फोन कॉल ने सुनीता को चिंता में डाल दिया । अजय ने पूछा -  ' किसका फोन है ' ?
 --तरुण का। माँ -बाबा के जाने के बाद अकेला हो गया है। बहुत उदास है ।  हताश  भी । पूछ रहा - कब आओगी?
 अजय  --' बुला लो यहीं. तुम कब तक रहोगी?  उसे अच्छा लगेगा यहाँ । 
सुनीता --  सही,   पर कैसे?  मम्मी जी - पापा जी  मानेंगें? 
अजय-   भाई है. हम साथ नहीं देंगे तो बिखर जायेगा । यहीं रहे जब तक उसका मन हो ।
सुनीता  -- उम्मीद कम है मुझे । दोनों मान जायें तब है।  ससुराल है सो वह भी  कम  आता है।
अजय - 'चलता हूँ ऑफिस अब'।
सुनीता उसे दरवाज़े तक छोड़ने आयी फिर किचन में  रमा को  रोटी बनाने का कहा। 
बैठक में  सास - ससुर टीवी  देख रहे थे।   उसे आता देख ससुर जी ने टीवी बँद कर दिया। सुनीता ने धीरे से बात शुरू की।
-:'ममी जी ! तरुण बहुत परेशान  है। आज बात हुई तो बहुत उदास  था। ठीक से पढ़ नहीं पा रहा है। अगर यहाँ रहे तो उसे  साथ मिल जायेगा। । आलोक के साथ कॉलेज भी। मैं तो वहाँ  रह नहीं  सकती। '.
चश्मा उतार कर जोर से बोलीं ममीजी -
' क्यों ? यहाँ कैसे? उसका अपना घर है न ?  बाई रख ले  वहाँ। यह कोई धर्मशाला नहीं ?  मेरा घर है यह मेरा। मेरी मर्ज़ी के बिना    तुम हो यहाँ यही काफी है। अजय की ज़िद न होती तो तुम्हें कभी न स्वीकारती ।  
सुनीता -- ' मम्मीजी!  क्या बोल रहे हो आप ?   इस उम्र में वह बिगड़  सकता है.मेरे अलावा है कौन उसका ?  उसे देखना जरुरी है .
 --'  कह दिया न  यहाँ नहीं रहेगा वह।  तुम  चाहो तो  जाओ ।  बहू हो बहू की तरह  रहो।  कोई हक़ न जताओ'। 
सुनीता की ऑंखें बह निकलीं। ओह ! अजय की ज़िद जीत तो गयी पर  मुझे  न घर दे सकी न अपनापन।
बहस  आगे बढ़ती  पर बीच में ससुर जी  बोले '  सुनीता! सब सुना  । तुम क्या कहती हो साधना ? बहू का यह घर नहीं? तरुण  क्यों नहीं रह सकता ?आलोक  है न तुम्हारा छोटा । ये पूरा ध्यान  रखती है न उसका ?
सासु जी - कह दिया  जो चाहूँगी वही होगा इस घर में। आप न बोलो बीच में ' ।
 आर्मी से रिटायर्ड ससुर जी का धैर्य  जवाब दे गया। चीख पड़े, ' तुम्हारा घर है ?  मेरा नहीं ? दोनों  बेटों का नहीं ? इसका नहीं? सुनो।  यह घर मेरा है सिर्फ मेरा। खून पसीने से बनाया है, पर सबके लिए । 
बहू !   तरुण को बुला लो। घुट -घुट के क्यों रहेगा ? । बहन हो तुम। माँ की तरह उसका ख्याल रखना ।  आलोक के साथ ही। ठीक ?
- तुम साधना!  अब बहू से कुछ नहीं कहना ।  तुम्हें तो बेटी चाहिए थी ? अब  बेटी सी बहू मिली तो कैसी बात कर रही हो ? हमारे - तुम्हारे बाद  बहू को ही तो सबका ध्यान रखना है।  समझ लो , तरुण तीसरे बेटे की तरह रहेगा।  
 सुनीता कठोर अनुशासन वाले ससुर जी का यह वात्सल्य रूप देख आश्चर्य से उन्हें देखती रह गयी।  उसकी सवाल भरी नज़रें साधना की ओर उठ गयीं ? 
  साधना के चेहरे के रंग बदलते गए, और फिर एक कोमल भाव ठहर गया। उन्होंने आवाज दी,' रमा खाना लगा दो' और दोनों को डाइनिंग टेबल की ओर चलने का इशारा कर  दिया। 
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क्षितिज के लिए जून।

🌸चैटिंग*🌸
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          सोमा  जब -तब मोबाइल पर व्यस्त रहती। सुबह- शाम,खाते- पीते यहाँ तक की  बाथरूम में भी। मोबाइल हमेशा कान पर ही लगा रहता।माँ  से रोज़ की तरह आज फिर बहस शुरू हो गयी।
माँ  -'  रोज़ की बीमारी यह मोबाइल,स्कूल नहीं जाना ?  ,देर नहीं हो रही,आज फिर बस के पीछे दौड़ना है?
  सोमा --माँ! क्यों पीछे पड़ी हो? जा रही  तैयार होने।
माँ -- ' दिन भर चैटिंग ? बेटा ! पढ़ाई कब होगी?  एग्जाम हैं न अगले  माह, आखिर बारहवीं का बोर्ड है न ? 
सोमा -- हाँ !  सुनीता जी! प्री बोर्ड के लिए ही तो कृष्णा से चैट कर रही। नोट्स शेयर कर रही। अच्छे नंबर न लाऊँ तो कहना ।' -उद्धत सुर में सोमा ने जवाब दिया। अक्सर वह माँ का नाम ले लेती  है। पर आज माँ  हँसने की जगह मौन रही। 
माँ -  ' टाइम लग रहा तो उसके घर जाकर लिख लाओ। कहाँ रहती है ? दिखाओ तो,थोड़ा तो मैं ही बता दूँगी,' । और हाथ बढ़ा दिया मोबाइल लेने के लिये।
सोमा सकपका गयी। मोबाइल चादर में सरका कर बोली - 'नहीं न। आप  क्या समझोगी ?  शार्ट में है सब।'- 
 और झटके से तैयार होने चली गयी।
     सुनीता-  'हाँ, एमएससी  यूँ ही कर ली मैंने ?  नहीं समझूंगी तुम्हारा कोर्स?  समझते क्या हैं आजकल के बच्चे माँ -बाप को'  ? 
बड़बड़ाते  हुऐ वह बिस्तर ठीक करने लगी  कि चादर के नीचे से मोबाइल  वाइब्रेट करने लगा। मोबाइल  उठा  कर देखा. श्री कृष्णा के नाम से स्क्रीन झपझपा  रही थी। ऑन किया तो अजीब उल्टी- सीधी  आवाज़ें सुनाई दीं- ' ' ' ओये,.... जान.. जानू.। .स्कूल तो आओगी न? 
चौँक कर झट से काट  दी कॉल सुनीता ने। देखा उस नाम और नंबर की सारी चैट डिलीटेड थी।  न नोट्स  न  मैसेज दिखे।
सिर्फ अब एक मैसेज -'-वेटिंग -कम सून' ' छप गया गया।
 सुनीता की दिल बैठ गया -क्या करे अब?कुछ कहूँ अभी ? या मोबाइल छुपा दूँ?  तो स्कूल ही नहीं जायेगी। जिद्दी  है सोमा। 
  दो मिनट में ही स्थिर हो सुनीता ने तय कर लिया  अभी कुछ कहना बेकार है।समझाऊंगी तो पुराने विचार  का कह टाल  देगी। बहाना बना देगी। इस उम्र में कौन अपनी गलती मानेगा? उसने जल्दी से  नंबर    डायरी में लिख लिया। मैसेज का स्क्रीनशॉट ले मोबाइल वहीं रख दिया टेबल पर। अब रात को  रोमेश से बात करके  तय करेगी।  कुछ तो  करना होगा  आगे। 
  तैयार हो कर आयी सोमा तो माँ को अभी भी कमरे में देख  चौँक गयी। उसकी नज़र  बदली जगह पर रखे मोबाइल पर और सुनीता की खोजती नज़र  सोमा के चेहरे पर  टिक गयीं। उनमें  सिर्फ सवाल थे जवाब नहीं। 

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चैटिंग*🌸 । -------------- जब देखो तब रोमा मोबाइल पर व्यस्त रहती। यहॉँ तक कि खाते समय भी। माँ सुनीता परेशान हो जाती, न आँखों का ध्यान न समय का। आज तो हद हो गयी स्कूल जाने का समय हो गया और अभी तक रोमा तैयार ही नहीं हुईं। चिल्ला पड़ी अब तो--- ' दिन भर चैटिंग करती रहती हो ? बेटा ! पढ़ाई नहीं करना ? एग्जाम हैं न अगले माह, आखिर बारहवीं का बोर्ड है न? -- अरे माँ! उसी के लिये तो कृष्णा से चैट कर रही देखो, नोट्स शेयर कर रही।उद्धत सुर में सोमा ने जवाब दिया। --- स्कूल नहीं जाना ? इतना टाइम लग रहा तो उस के घर जाकर लिख लाओ ? दिखाओ ? थोड़ा तो मैं ही बता दूँगी।' सुनीता ने हाथ बढ़ा दिया मोबाइल लेने के लिये।रोमा सकपका गयी, - ' नहीं न। आपको क्या समझ आएगा ? शार्ट में है सब।'- फिर तैयार होने चली गयी। सुनीता बिस्तर ठीक करने लगी। लगा मोबाइल चादर के नीचे से वाइब्रेट कर रहा था। मोबाइल उठा कर देखा श्री कृष्णा के नाम से स्क्रीन झपझप कर रही । ऑन किया तो अजीब उल्टी- सीधी कराहटें सुनाई दीं- ' ' ' माय लव, इलू इलू की..'। चौँक कर झट से काट दी कॉल। देखा उस नाम और नं की सारी चैट डिलीट थी। न नोट्स दिखे न कुछ और। सुनीता की दिल बैठ गया। अब ? रोमा से अभी कुछ कहना बेकार है। इस उम्र में सुनेगी - मानेगी नहीं । जल्दी से नंबर डायरी में लिख लिया। अब रात को रोमेश से बात करके ही तय करेगी,आगे क्या कैसे?

Monday, May 25, 2026

पढ़ाई का बोझ --

      राजन --'पापा, टीचर रोज़ टोकतीं हैं। मेरी                                किताबें?  कब चलोगे बाजार ?'
    रमेश - 'बेटा चलेंगे जल्दी ही  ? '
 वे मन में सोच रहे, इतनी जल्दी रिजल्ट आया ही क्यों?
  फिर वही खर्चे फीस, किताब,कॉपी - बैग आदि के। 
   रमेश आज कल की कह उसे टाल रहे थे । उन्हें              इंतज़ार था पहली तारीख पर  तनख्वाह मिलने का।        राजन ने आठवीं क्लास में अच्छी ग्रेड पायी थी । रिजल्ट के साथ नवीं क्लास की  किताबों -कॉपीज़, रेफ. बुक्स और अन्य जरूरी सामान की सूची  और एक स्लिप  भी मिली थी। उसमें दुकान का नाम और पता भी था।
 आज वह बाजार जा रहा था  पिता  के साथ। खुशी से उछलता- भागता ,भीड़ में जगह बनाता पापा को खीँचता ले जा रहा था। एक बड़ी सी दुकान पर वह  ठिठक गया 'पापा यहीं से लेना है ? देखो यहाँ बैग्स भी हैं।' 
रमेश ने सिर हिला दिया और लिस्ट काउंटर पर देकर किताबें और कॉपी देने कहा।  जब तक किताबें आतीं - राजन रंग -बिरंगे बैग्स टटोलता रहा। कभी काला कभी भूरा और कभी लाल। अंत में उसने लाल बैग पसंद किया।
 दुकानदार ने किताब -कॉपी का अलग अलग बिल बना कर रमेश को थमा दिया. ओह! इतनी सारी ? हज़ारों का बिल देख कर वे चौँक गए। 
-- पूछा - इतना? सब  लेना होगा, अभी  ? 
-- हाँ ! साहब, पूरी हैं ये।इस स्कूल  का सारा काम यहीं से होता है। इसमें रेफेरेंस बुक्स भी हैं,और साल भर का दूसरा  जरुरी सामान भी। 
 रमेश क्या कहते.? राजन के दमकते  चेहरे पर नज़र  गयी। फिर  चुपचाप भगतान कर दिया । लेकिन इतना वज़न ?  कैसे ले जाएँगें ? कोशिश की पर वे  उठा नहीं सके। 
दुकानदार ने कहा- ' आप  रहने दें . हम पार्किंग तक भेज देंगे। आप आगे चलिए।
  रमेश ने आगे बढ़ते हुए बोले -- ठीक,  भेजिए फिर।
  एक ठेले पर  बहुत से पैकेटस में किताबें आदि सामान रख कर उनका सेवक पट्टा  बाँधे  तैयार था। वे आगे- आगे और ठेला पीछे -पीछे।  सोचने लगे कहाँ हमारे समय में तो एक माँ के बनाये कपड़े के थैले में ही सब किताब कॉपी आ जातीं थीं। और अब  कुली सा बैग, वज़न इतना  ? इतनी सब बच्चे पढ़ेंगे कब और कैसे?  
     पीछे मुड़ कर देखा तो आँखों में अंधेरा  छा गया । उन्हें लगा टाई लगाए  यूनिफार्म पहने राजन ही  ठेला खींच रहा है। 15- 20 किलो के वज़न का  बैग लादे चला आ रहा । बोझ घसीटता बाल मज़दूर सा।
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Monday, November 4, 2024

तरु --

*बाप*
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     अक्षत पांडे, नॉएडा 
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बलिश्त भर के थे तुम जब पहली बार देखा था 
एक डोर से जुड़े थे अपनी माँ से जिसका कोई सिरा न था,
आँख मेरी गीली थी,न जाने कहाँ से ये नूर उतरा था 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है 

नहला -धुला के पौंछ के तुमको, मेरी गोद में रख दिया गया 
अपने आप ही मेरे हाथ, एक l शेप का पालना बन गया 
एक टुकड़ा मेरी शख्सियत का आज मेरी गोद में सोता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है। 

नानी दादी  मौसी -आया से तुम घिरे रहते थे 
सब अपना हक़ जताते थे,
एक पल पकड़ने के लिये तुमको सब आपस में लड़ जाते थे 
जो दूर खडे हुए एक मर्द की एक्टिंग करते  सोचता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है

वो फुदकिया सा इधर उधर बस, घर को नापे रहता है 
कभी चादर से, कभी बिस्तर के नीचे से जुगनू सा चमकता है 
माँ जब शिकायत तेरी करती ,मैं धीरे से कह देता हूँ, जाने दो अभी छोटा है। 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है,

पहली चोट तुम्हारी वो पहला खूँ तुम्हारा मेरी आँखों में उतर आया था 
उधर ज़ख्म भरे तुम्हारे और इधर मैंने दुनिया को माफ कर दिया 
जब दर्द हो तुम्हें, कुछ अंदर तक टूटता है 
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है 

बड़े हो रहे हो अब, एक दोस्त बनता नज़र आता है मेरा
न कभी तुम जवाँ होना न मैं कभी उम्र दराज़ 
ताली मारते -साइकिल चलाते  और मम्मी की टांग  खिंचते  गुज़र  जाएगी 
लोगों को बताना फिर कि ऐसा भी बाप होता है।
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Tuesday, September 10, 2024

व्यवहारिक शिक्षा

       किताबी शिक्षा और व्यवहारिक शिक्षा में अंतर हैं। किताबी   ज्ञान एक तरह से औपचारिक ही है। जीवन के लिये कैसी शिक्षा  उपयोगी  होगी?  यह नहीं देखा जाता।    शिक्षा व्यवस्था में परम्परागत विषय पढ़ाये जातें हैं। एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग इनसे जीवन नहीं निकाल पा रहा। लिखित रूप में क्या विषय है  ?   काम कैसे  करना चाहिए ? आदि नहीं सिखाया जाता।। वहीं व्यावसायिक शिक्षा में हमें व्यावहारिक तौर   पर सिखाया जाता है क्या   काम /जॉब कैसे करना है?किताबी शिक्षा से  ज्ञान बढ़ता है. कोर्स की  औपचारिक डिग्री जरूर मिलती है। लेकिन व्यवहारिक शिक्षा से हम सीखते हैं कि कैसे किसी काम को असली जीवन में  कैसे लागू करना है। आने वाली स्थितियों में कैसे संतुलन करना है। काम करने की कुशलता और  उसे स्तरीय बनाना अलग बात है। इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आस -पास के माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता  है। स्कूल-  कॉलेज आज भी डिग्री ही दे रहे हैं। बाकी ओर उनका ध्यान कम ही है। इसलिए प्रशिक्षण और कोचिंग संस्थान बहुत बढ़ रहे हैं। मेडिकल,इंजीनियरिंग और विज्ञान के विषय में भी प्रैक्टिकल  जरूर होते हैं। फिर भी वे रोज़गार और बाह्य संस्थानों और रोज़गार के उपयुक्त कम ही हैं। स्पष्ट है कि उद्योगों के अनुरूप जॉब  और अभ्यर्थी नहीं मिल रहे। आज की प्रतिद्वन्दी  समाज और  माहौल में यह सबऔर अधिक संवेदनशील  होता जा रहा है।प्रशिक्षण, जॉब, कुशलता और सफलता पाना कठिन हो रहे है। इसलिए ही उनमें मानसिक और सामाजिक विचलन भी दिख रहे हैं।  व्यावहारिक शिक्षा की जरूरत समझी  तो जाती है। पर इसके अवसर आज भी कम और महेंगे भी।  सर्वसुलभ  तो हैं भी नहीं। ऐसे में संभावनाएं अंनत हैं। इस और अकादमिक क्षेत्र,सरकार, उद्योगों और संस्थानों के नियोजित प्रयास जरुरी हैं पर कब कौन कैसे करेगा? यह नहीं कहा जा सकता।

औपचारिक शिक्षा व्यवस्था अब कह सकते हैं मज़बूत होने की बजाय सक्षम नहीं कही जा सकती।  निजी क्षेत्र  में शिक्षा  बहुत  महंगी, सरकारी - अक्षम और बाकी एक बड़े वर्ग के लिये उपयुक्त नहीं रही। शिक्षा नीति बनती है पर उसका क्रियान्वयन का हाल ठीक नहीं। पूरे देश में 20-30%  ही उपयुक्त हैं बाकी सब अनियमित, अक्षम और अनुपयुक्त। ऐसे में निराश, बेरोज़गार , अक्षम  - श्रम शक्ति ही बढ़ चुकी है। देखा जाए तो आमूलचूल   नयी व्यवस्था की जरुरत है  हर स्तर पर।  प्राइमरी, स्नातक और फिर तकनीक विषयों की शिक्षा के लिये।  समाज में स्थापित होने  के लिये  शिक्षा के साथ अन्य नैतिक - सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी जरुरी है।  इंसान मशीन की तरह भी काम नहीं कर सकता।   मानवीय व्यवहार का दृष्टिकोण आज बहुत जरुरी है। इन दोनों को साथ जोड़ कर ही सर्वाँगींण शिक्षा दी जाये वही देश के लिये उपयुक्त होगा।

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है 



Monday, September 9, 2024

हिंदी भाषा

🌸हिंदी दिवस🌸
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        🌸 क्षणिकाएँ 🌸
 '1-अंग्रेजी चाहे  जितनी पढेँ, ज्ञान गुण भले  बढ़ जाये 
प्यासा मन  तभी तृप्त हो जब निज भाषा बोली जाये,
सरल सहज संवाद से जो जन - जन को जोड़े 
चारों दिशाओं में प्रसारित हो हर बोली से गले मिले 
  यही हमारी प्रिय हिंदी  है -प्रिय मातृ भाषा है।
  आज  का ही केवल खास दिवस नहीं है इसका 
     प्रतिदिन ही मंगल  पर्व- समारोह  है   ।==================================
 2-    
       अपनी  भाषा -  हिंदी  नदी की धारा सी है  
        न जाने कितनी बोली,भाषाओं को 
            अपने अंतर में समाती आयी है 
              नये शब्द नये रुप- स्वरूप ले
               यह आगे बढ़ती  ही जाती है 
           रोक सकी न कोई  और भाषा 
          इसके तेज  प्रवाह  प्रभाव को 
       इसीलिए देश की भाषा हिंदी 
     सब बोली और भाषाओं की सरमौर है ।
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  3- 🌸 "हिंदी दिवस "🌸
             -- क्षणिका --
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  3 *  कोरे पन्ने पर जब  जब भी कलम चली 
     प्राण प्रतिष्ठित हिंदी भाषा के अक्षर उभर आते हैं 
    जब भी  कुछ सोचा और कुछ कहना चाहा
     मनो भाव मेरे सब  शब्दों में  ढल जाते हैं 
     सुःख दुख -पीड़ा -परपीड़ा एक कविता में ढल गए 
       योग-संयोग - वियोग  के पल भी 
       कुछ कहानियों में   रच  गए 
      पहली कुहूक और अंतिम  बोल अपनी बोली में 
       जीवन -मरण का  जीवंत कथानक कह गए  । 
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 4-- फिर आ गया है हिंदी दिवस 
      पर्व  मनेगा बंद कमरों और समारोहों में 
      टाई सूट पहन कर हैप्पी हिंदी दिवस कहेँगे 
      कसमे वादे किये जायेंगे बस संकल्प न पूरे होंगे 
      कागज़ पर लिखे जायेंगे आदेश 
      सरकने लगेंगी  धीरे धीरे फ़ाइलें भी 
      जो कभी न पहुंचेंगी मंज़िल पर 
       न जाने  ऐसे कितने दिन और साल बीते 
      किसी को याद न आयी राष्ट्रभाषा की 
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     अंग्रेजी स्कूल में पढ़ लिख कर 
     बने डॉक्टर और इंजीनियर 
     हुईं मशक़्कत अब रोज़ी रोटी की
     और  हुआ सामना अनपढ़ और गरीब 
        बेहाल मरीज़ों और मज़दूरों से 
     अंग्रेजी का दिमाग़ सोचे क्या  और कैसे बोले ?
       गले में अटक गयी अंग्रेजी कंकड सी 
        ज़ुबान भी कुछ ऐंठ गयी 
        रोज़ी रोटी की चिंता में 
        हिंदी   ही तारणहार बनी 
       पूछे हाल -चाल  अपनी बोली में 
        बिन हिंदी बोले   क्या काम  चले?
        
         
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