----------
आज फिर जिद कर रहा था राजन --
राजन --'पापा, टीचर रोज़ टोकतीं हैं। चार दिन हो गए। नाइ कस की मेरी किताब कॉपी ? कब चलोगे बाजार ?'
रमेश - 'बेटा चलेंगे जल्दी ही ? '
वे मन में सोच रहे थे -, इतनी जल्दी रिजल्ट आया ही क्यों? स्कूल खुल गए। वही खर्चे फीस, किताब,कॉपी - बैग आदि के। रमेश टाल रहे थे । इंतज़ार था पहली तारीख का तनख्वाह का। मिले तो जाएँ बाजार।
राजन ने आठवीं क्लास में अच्छी ग्रेड पायी थी । रिजल्ट के साथ नवीं क्लास की किताबों -कॉपीज़, रफ. बुक्स और अन्य जरूरी सामान की सूची और एक स्लिप भी मिली थी। उसमें दुकान का नाम और पता भी था।
आज वह बाजार जा रहा था पिता के साथ। खुशी से उछलता,भीड़ में जगह बनाता पापा को खीँचता ले जा रहा था। एक बड़ी सी दुकान पर वह ठिठक गया 'पापा यहीं से लेना है ? देखो यहाँ बैग्स भी हैं।'
रमेश ने सिर हिला दिया और लिस्ट काउंटर पर देकर किताबें और कॉपी देने कहा। जब तक किताबें आतीं - राजन रंग -बिरंगे बैग्स टटोलता रहा। कभी काला कभी भूरा और कभी लाल। अंत में उसने लाल बैग पसंद किया।
दुकानदार ने किताब -कॉपी का अलग अलग बिल बना कर रमेश को थमा दिया. ओह! इतना ? हज़ारों का बिल देख कर वे चौँक गए।
-- पूछा - इतना? सब लेना होगा, अभी ही ?
-- हाँ ! साहब, सभी ।इस स्कूल का सारा काम यहीं से होता है। इसमें रेफेरेंस बुक्स भी हैं,और साल भर का दूसरा जरुरी सामान भी।
रमेश क्या कहते.? राजन के दमकते चेहरे पर नज़र गयी। चुपचाप भगतान कर दिया । लेकिन इतना वज़न ? कैसे ले जाएँगें ? कोशिश की पर वे उठा नहीं सके।
दुकानदार ने कहा- ' आप रहने दें . हम पार्किंग तक भेज देंगे। आप आगे चलिए।
रमेश ने आगे बढ़ते हुए बोले -- ठीक, भेजिए फिर।
एक ठेले पर बहुत से पैकेट्स में किताबें आदि सामान रख कर उनका सेवक पट्टा बाँधे तैयार था। वे आगे- आगे और ठेला पीछे -पीछे। सोचने लगे कहाँ हमारी तो माँ के बनाये कपड़े के थैले में ही सब किताब -कॉपी आ जातीं थीं। और अब ? कुली सा बैग -भारी। इतनी सब किताबें बच्चे पढ़ेंगे कब और कैसे?
पीछे मुड़ कर देखा तो आँखों में अँधेरा छा गया । उन्हें लगा टाई लगाए यूनिफार्म पहने सिर झुकाये राजन ही ठेला खींच रहा है। 15- 20 किलो के वज़न का बैग लादे चला आ रहा । बोझ घसीटता बाल मज़दूर सा।
==================================