🌸कैसा ऐतबार?" 🌸
============≠=
.सिया और रोशन एक ही कॉलेज में साथ पढ़ते आये। तीन साल पहले रोशन पास के कस्बे से पढ़ने आया था। हॉस्टल का अनुशासन उसे रास नहीं आना था। एक अलग कमरा किराये पर लेकर कर रहना पसंद किया। उसकी मंशा शहर के माहौल में वह आज़ाद पंछी की तरह उड़ने की थी । यूँ भी एक दूर के भाई के अलावा यहाँ और कोई था नहीं उसका। उनसे भी वह काम होने पर ही मिलने जाता। वरना बस कॉलेज और घुमक्कड़ी यही शौक बन गए उसके। अपनी मित्र मण्डली बना रोज़ शाम को टपरी पर चाय के साथ गपशप करना शगल था उसका। ये सब क्लास में कम और खेल के मैदान में ज्यादा दिखते । पास होने लायक नंबर आ जाएँ इससे ज्यादा वह नहीं सोचता। स्वभाव से खिलन्दड़ और हँसमुख राकेश जल्दी ही मशहूर हो गया। छोटी सी बात को भी ऐसे बढ़ा -चढा कर कहता कि मित्र मंडली उसपर या तो भरोसा कर लेते या फिर हँस देते।
सिया भी उनमें से एक थी । व्यवसायी परिवार की इकलौती लाड़ प्यार में पली बेटी। थोड़ी ज़िद्दी थोड़ी सरल। उसकी लच्छेदार बातों पर खूब हँसती । सिया के सीधे - सादे रूप और मासूमियत से रोशन जैसा तेज़ तर्रार लड़का भी आकर्षित हो गया । धीरे - धीरे दोनों प्यार की गिरफ्त में आ गए। वे रोज़ मिलते और अपनी निजी बातें भी शेयर करने लगे। जो सिया कभी किसी से खुल कर नहीं मिलती पर वह रोशन से अपने आप को छुपा नहीं पाती।अपने घर की हर बात शेयर कर देती।
" बीस साला प्यार 'में डूबे दोनों ने कस्मे -वादों की लम्बी फेहरिस्त भी बना ली। रोज़ कॉलेज आते- जाते मिलते और अक्सर छुट्टी के दिन सिनेमा या नाटक देखने चले जाते। देर रात नींद नहीं आती तो मोबाइल पर गपियाते रहते। जब जेब खाली होती तो पार्क के किसी कोने में गपशप करते। सिया का उस पर इतना विश्वास कि अपने घरवालों की रोक- टोक भी उसे भली नहीं लगती। माँ की समझाइश और भाई की तीखी नज़र उसे चुभती रहती। बेपरवाह हो उसने रोशन को अपना सब कुछ मान लिया माँ -बाबा से भी ज्यादा ।
उसकी दोस्त आरती यह सब समझ कर कई बार बोली भी ' ' बहना, आजकल पढ़ाई में मन नहीं लग रहा, क्या बात है ? रोशन पर इतना ऐतबार अच्छा नहीं। मनचला सा लगता है। कितना जानती हो उसके बारे में ? उसके घर वालों को जानती भी हो?।'
सिया ने सुन तो लिया पर तेज़ी से जवाब भी दे दिया " हाँ!.तुमने देखा न ?, अरे, कितना पसंद करता है मुझे ? जान देने को तैयार रहता है। बोल रहा था, अब हम साथ रहेंगे जीवन भर "। कितनी मदद करता है पढ़ाई में मेरी, कल ही किताबें और नोट्स दिए हैं। ? पता है न ?' बताते हुए उसके चेहरा सिंदूरी हो आया।
आरती ने उसे फिर समझाया " पढ़ाई तो पूरी कर लो, फिर सोचना और कुछ। बाकी जो करना है कर। पता है उसका घर- बार कुछ खास नहीं है। तेरा गुज़ारा नहीं होगा उसके साथ। रुक जा कुछ साल। पढ़ने दे और नौकरी तो करने दे उसे। फिर मत कहना चेताया नहीं तुझे। अख़बार नहीं पढ़ती? आजकल ऐसे मामलों की खबर ज्यादा आ रही है। मुझे वह ठीक नहीं लगता। कितना शो ऑफ़ करता है। बाबा रे। "
सिया ने उसकी बात हँस कर उड़ा दी।' जाने दे तुम नहीं समझोगी '।
उसकी आँखों में रोशन की छवि छायी हुई थी। बेचैनी बढ़ी तो उसे कॉल कर बुला लिया कैंटीन के पीछे। पूरे अधिकार से पूछा ' क्या सोचा है तुमने ? -" कब साथ रहेंगे हम ? पता है लोग बात बनाने लगे हैं। ". रोशन को जैसे मौका मिल गया, उसके मन की बात जो पूछ ली सिया ने। बोला " देखो, मैं अकेला रहता हूँ। क्या बताऊँ ? पढ़ाई भी इस साल खत्म होगी उसके बाद ही कुछ काम -धंधा कर पाउँगा। अभी मेरे पास तो कुछ है नहीं ज़्यादा। अकेला क्या करुँगा? घर तो नहीं चला पाउँगा। रिया इशारा समझ कर खुश हो गयी। कहा "तुम चिंता क्यूँ करते हो, मैं भी तो कुछ कर सकती हूँ। रुको दो -तीन दिन। '
जिद्दी रिया अपना वादा पूरा करे पर तुल गयी। तीन दिन बाद ही वह घर से अपने कुछ कपड़े, जमा राशि और कुछ गहने लेकर चुपचाप उसके कमरे पर पहुँच गयी . रोशन उसके तेवर देख चौँक गया। ऊपर से सामान्य होने की कोशिश की पर मन में जैसे लड्डू फूटने लगे। उसकी मंशा अपने आप पूरी जो हो रही थी। उसने भी बोरिया बिस्तर बाँध लिया। सब सामान समेट कर तैयार हो गया।
प्यार में डूबी सिया को रोशन के सिवा कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। रोशन ने एक कॉल लगाया और फुसफसा कर बात की। सिया के पूछने पर टाल दिया "मेरा दोस्त है उसी को किया फोन। चलो तुम तो।' वह उसे अपने एक दोस्त समीर के यहाँ ले गया,
बोला " रिया! तुम्हारे घर वाले तुम्हें ले न जायें। इसलिए इस के साथ रहना होगा कुछ दिन। " सिया ने हामी भर दी । . सपनों में खोयी सिया ने उस दोस्त और उसके घर पर ध्यान नहीं दिया। जबकि वह नशे में था, बेहाल सा,और घर में भी कोई ढंग का समान नहीं था । जो था वह भी मामूली और बिखरा हुआ। उसने सिया को दूसरे कमरे में भेज दिया। वे दोनों बाहर धीरे - धीरे बात करने लगे।
सिया को कुछ सुनाई नहीं दिया। बाजार से मंगा कर चाय- नाश्ता दे कर रोशन ने उसे आराम करने को कह दिया। सिया को तो अपना घर बसाने की तमन्ना थी। ,बोली 'अब आगे ? यहाँ कब तक रहेंगे। यहाँ अच्छा नहीं लग रहा। चलो कहीं और.। नौकरी करनी होगी न ?वरना कैसे चलेगा काम '? .
रोशन ने लापरवाही से कहा ' क्या जल्दी है ? आराम से रहो। हो जायेगा सब इंतज़ाम। सिया ने फिर पूछा " पैसे कहाँ से आएंगे। जो लायी हूँ वो कभी तो ख़त्म होंगे न ? ज्यादा हैं भी नहीं। " राकेश झटके से तुरंत बोला " कम हैं ? अरे! मुझे लगा तुम बंदोबस्त करके आयी होगी? ' कुछ सोचा नहीं तुमने ? चलो ये है ना समीर,ये दे देगा.'
सिया को शंका होने लगी ' क्यूँ देगा ये ? इसकी हालत देखी ? लगता नहीं ये कुछ खास कमाता होगा। फिर चुकाओगे कैसे "?
राकेश ने धीरे से कहा " तुम चुकाओगी ना, मेरे और उसमें कोई फर्क नहीं। तुम्हें उसके साथ भी ऐसे ही रहना होगा। कल इसका भाई भी आ जायेगा। और काम कहाँ है मेरे पास ?. " सुन कर सिया सन्न रह गयी, " मतलब क्या है ? पूछ बैठी ' सौदा करोगे "?
राकेश बेशर्मी से बोला " ना तो ऐसे ही खिलाने रखा है उसने हमें ? सुनो, कल दो दिन के लिए गाँव जा रहा हूँ. अम्मी से बात करने, तुन्हें यहीं रहना होगा। वो भी उसके हिसाब से।मैं पहले जा कर वहाँ बात करके आता हूँ। तब ले चलूँगा तुम्हें घर।
रिया हैरान, - ' हैं,! ? पूछ कर आओगे? 'क्या मतलब है इसका ?-
यही कह पायी। रिया बिना कुछ कहे अंदर कमरे में चली गयी.अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया। अब उसे आरती की चेतावनी याद आ गयी। माँ की परखती नज़र भी। डर गयी अब क्या होगा ? उसने तो रोशन को कभी स्पर्श तक नहीं करने दिया। बाकी सब मुहंजबानी ख्याली पुलाव ही पकाती रही अब तक। उसका परिणाम यह निकलेगा ? अम्मी? ये क्या हुआ इसकी मम्मी अम्मी कब से बन गयी? सही सुना या नहीं - अम्मी अम्मी दिमाग़ में घूमने लगा ये सम्बोधन। क्या होगा अब आगे ? कुछ सोच कर आरती को ही फोन किया। रुआँसी हो आयी, पर सब बता दिया। वह भी चौंक गयी सिया के दुस्साहस से, बोली " अब पता चला ? कहा गयी धोखा? मना किया था तुम्हें? अच्छा रुको, अभी कुछ मत बोलना रोशन से. कुछ करती हूँ.अपनी लोकेशन और पता भेजो जल्दी। . कैसे भी बहाना करके तुम शाम पाँच बजे घर के बाहर गेट के पास रहना। ठीक ? घबराना मत और जगह भी मत बदलना। मोबाइल अपने पास छुपा कर रखना। "
सिर दर्द का बहाना कर वह कमरे ही लेटी रही
दिमाग़ कुलबुलाता रहा। जिस पर एतबार किया उसी ने ऐसा धोखा दिया ? प्यार का भूत उतर गया उसका। सीधी थी वह पर इतनी बेवकूफ भी नहीं की गटर में उतर जाये। आशंका और घबराहट मन में घुमड़ रही थी।
शाम की चाय की पुकार हुई तो बाहर निकल आयी।चाय पीने कुर्सी पर बैठ गयी पर नज़र गेट पर जमा दी। घड़ी देखी, पाँच बजने को आये। दिल धकधक करने लगा। आरती नहीं आयी तो ? एक छाया दिखी वह तुरंत ख़डी हो गयी। कुर्सी को लात मार गिरा कर भागी गेट की ओर । रोशन घबरा कर उसके पीछे भागता पर कुर्सी से उलझ कर मुहँ के बल गिर गया। समीर पास पड़ा डंडा उठा कर दौड़ता इससे पहले ही आरती और उसका भाई गेट खोल कर सामने आ गए। दोनों ने सिया को बाहर खींच लिया। वह आरती से चिपक गयी रोते - रोते। जीप से उतर कर दौड़ते हुए सिपाही ने समीर को धक्का देकर गिरा दिया। उसी के डंडे से दो जमा दिए उस पर धाड़ धाड़ । वह दोहरा हो गया। दूसरे ने रोशन को जकड़ लिया। दोनों को जीप में धकेल दिया जो थाने जाकर ही रुकी । आरती ने सिया को अपनी कार में बिठाया, पानी पिला कर कहा " देख लिया अंजाम ? " सिया के मुँह से बोल नहीं फूटे, हाथ जोड़ कर उसके कंधे पर ढलक गयी। आधे घंटे बाद थाने में कार रुकी। समीर और रोशन हवालत में धकेले गए। इंस्पेक्टर ने सिया को अलग टेबल पर बुलाया, पूछताछ की और बयान लिखवाये। पूरी कहानी सुन कर कहा ' अच्छे घर की लगती हो। ऐसी पढ़ाई लिखाई की है ? बंद कर दूँ तुम्हें भी ?
सिया आँसू बहाती गठरी बनी बैठी रही। क्या कहती? सब उसी का रचाया खेल जो था। कैसे देखे बाहर बेंच पर सिर नीचे किये अपने पिता और बड़े भईया को ? वे बैठे थे, उदास, निराश और शर्मिंदा। उनकी आँखों में सवाल ही सवाल थे . आखिर क्या कमी रह गयी उनकी परवरिश में ? सिया रोती हुई उनके पैरों गिर गयी। क्या सफाई देती ? आखिर उसके इस अपराध की माफ़ी तो हो नहीं सकती । माँ -पिता का विश्वास खो कर अब क्या करेगी वह ?
इन चार- पाँच घंटों में उसकी दुनिया बदल चुकी थी। जैसे फिर नया जीवन मिला हो। वह समझ चुकी थी प्यार के नशे ने उसे धोखे के कुचक्र में फंसा दिया था । जिस आरती की उपेक्षा की आज उसी ने नरक में गिरने से बचाया । नज़र नीचे किये वह यही सोच रही थी कि क्या अब वह किसी पर ऐतबार कर सकेगी.? माँ- बाबा और आरती उसे माफ कर सकेगें ?
______________________=_______________
महिमा शुक्ला
9589024135
996,सुदामा नगर इंदौर (मप्र )