कुछ ज्यादा नहीं हुआ है,
बस वक़्त की सिलाई उधड़ गयी है '
कि जिसको कस के बांधा था,
कि जिसको बांध के सिल दिया था.
सुबह, दोपहर और शाम के धागों से.
बड़ा अजीब था वो कारखाना,
कि जिसमें धागों के रंग कोई भी हों.
सारे दिन एक से निकलते थे.
अब के दिन जैसे नर्म सफ़ेद चादर,
जिसको नींद आये तो ओढ़ लेता हूँ.
या किसो भी रंग में रंग लेता हूँ.
अब भूख भी वक़्त देख कर नहीं लगती ..
कि जैसे वक़्त से आज़ाद हो गया हूँ.
और घड़ियों में जंग लगने लगी है.
कुछ अश्वतथामा जैसी कैफियत है,
कि दुनिया खत्म हुई हुई तो..
इस कैद से बरी हो जाऊँगा...
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