Tuesday, September 10, 2024

व्यवहारिक शिक्षा

       किताबी शिक्षा और व्यवहारिक शिक्षा में अंतर हैं। किताबी   ज्ञान एक तरह से औपचारिक ही है। जीवन के लिये कैसी शिक्षा  उपयोगी  होगी?  यह नहीं देखा जाता।    शिक्षा व्यवस्था में परम्परागत विषय पढ़ाये जातें हैं। एक बड़ा विद्यार्थी वर्ग इनसे जीवन नहीं निकाल पा रहा। लिखित रूप में क्या विषय है  ?   काम कैसे  करना चाहिए ? आदि नहीं सिखाया जाता।। वहीं व्यावसायिक शिक्षा में हमें व्यावहारिक तौर   पर सिखाया जाता है क्या   काम /जॉब कैसे करना है?किताबी शिक्षा से  ज्ञान बढ़ता है. कोर्स की  औपचारिक डिग्री जरूर मिलती है। लेकिन व्यवहारिक शिक्षा से हम सीखते हैं कि कैसे किसी काम को असली जीवन में  कैसे लागू करना है। आने वाली स्थितियों में कैसे संतुलन करना है। काम करने की कुशलता और  उसे स्तरीय बनाना अलग बात है। इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आस -पास के माहौल का बहुत प्रभाव पड़ता  है। स्कूल-  कॉलेज आज भी डिग्री ही दे रहे हैं। बाकी ओर उनका ध्यान कम ही है। इसलिए प्रशिक्षण और कोचिंग संस्थान बहुत बढ़ रहे हैं। मेडिकल,इंजीनियरिंग और विज्ञान के विषय में भी प्रैक्टिकल  जरूर होते हैं। फिर भी वे रोज़गार और बाह्य संस्थानों और रोज़गार के उपयुक्त कम ही हैं। स्पष्ट है कि उद्योगों के अनुरूप जॉब  और अभ्यर्थी नहीं मिल रहे। आज की प्रतिद्वन्दी  समाज और  माहौल में यह सबऔर अधिक संवेदनशील  होता जा रहा है।प्रशिक्षण, जॉब, कुशलता और सफलता पाना कठिन हो रहे है। इसलिए ही उनमें मानसिक और सामाजिक विचलन भी दिख रहे हैं।  व्यावहारिक शिक्षा की जरूरत समझी  तो जाती है। पर इसके अवसर आज भी कम और महेंगे भी।  सर्वसुलभ  तो हैं भी नहीं। ऐसे में संभावनाएं अंनत हैं। इस और अकादमिक क्षेत्र,सरकार, उद्योगों और संस्थानों के नियोजित प्रयास जरुरी हैं पर कब कौन कैसे करेगा? यह नहीं कहा जा सकता।

औपचारिक शिक्षा व्यवस्था अब कह सकते हैं मज़बूत होने की बजाय सक्षम नहीं कही जा सकती।  निजी क्षेत्र  में शिक्षा  बहुत  महंगी, सरकारी - अक्षम और बाकी एक बड़े वर्ग के लिये उपयुक्त नहीं रही। शिक्षा नीति बनती है पर उसका क्रियान्वयन का हाल ठीक नहीं। पूरे देश में 20-30%  ही उपयुक्त हैं बाकी सब अनियमित, अक्षम और अनुपयुक्त। ऐसे में निराश, बेरोज़गार , अक्षम  - श्रम शक्ति ही बढ़ चुकी है। देखा जाए तो आमूलचूल   नयी व्यवस्था की जरुरत है  हर स्तर पर।  प्राइमरी, स्नातक और फिर तकनीक विषयों की शिक्षा के लिये।  समाज में स्थापित होने  के लिये  शिक्षा के साथ अन्य नैतिक - सामाजिक मूल्यों की शिक्षा भी जरुरी है।  इंसान मशीन की तरह भी काम नहीं कर सकता।   मानवीय व्यवहार का दृष्टिकोण आज बहुत जरुरी है। इन दोनों को साथ जोड़ कर ही सर्वाँगींण शिक्षा दी जाये वही देश के लिये उपयुक्त होगा।

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है 



Monday, September 9, 2024

हिंदी भाषा

🌸हिंदी दिवस🌸
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        🌸 क्षणिकाएँ 🌸
 '1-अंग्रेजी चाहे  जितनी पढेँ, ज्ञान गुण भले  बढ़ जाये 
प्यासा मन  तभी तृप्त हो जब निज भाषा बोली जाये,
सरल सहज संवाद से जो जन - जन को जोड़े 
चारों दिशाओं में प्रसारित हो हर बोली से गले मिले 
  यही हमारी प्रिय हिंदी  है -प्रिय मातृ भाषा है।
  आज  का ही केवल खास दिवस नहीं है इसका 
     प्रतिदिन ही मंगल  पर्व- समारोह  है   ।==================================
 2-    
       अपनी  भाषा -  हिंदी  नदी की धारा सी है  
        न जाने कितनी बोली,भाषाओं को 
            अपने अंतर में समाती आयी है 
              नये शब्द नये रुप- स्वरूप ले
               यह आगे बढ़ती  ही जाती है 
           रोक सकी न कोई  और भाषा 
          इसके तेज  प्रवाह  प्रभाव को 
       इसीलिए देश की भाषा हिंदी 
     सब बोली और भाषाओं की सरमौर है ।
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  3- 🌸 "हिंदी दिवस "🌸
             -- क्षणिका --
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  3 *  कोरे पन्ने पर जब  जब भी कलम चली 
     प्राण प्रतिष्ठित हिंदी भाषा के अक्षर उभर आते हैं 
    जब भी  कुछ सोचा और कुछ कहना चाहा
     मनो भाव मेरे सब  शब्दों में  ढल जाते हैं 
     सुःख दुख -पीड़ा -परपीड़ा एक कविता में ढल गए 
       योग-संयोग - वियोग  के पल भी 
       कुछ कहानियों में   रच  गए 
      पहली कुहूक और अंतिम  बोल अपनी बोली में 
       जीवन -मरण का  जीवंत कथानक कह गए  । 
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 4-- फिर आ गया है हिंदी दिवस 
      पर्व  मनेगा बंद कमरों और समारोहों में 
      टाई सूट पहन कर हैप्पी हिंदी दिवस कहेँगे 
      कसमे वादे किये जायेंगे बस संकल्प न पूरे होंगे 
      कागज़ पर लिखे जायेंगे आदेश 
      सरकने लगेंगी  धीरे धीरे फ़ाइलें भी 
      जो कभी न पहुंचेंगी मंज़िल पर 
       न जाने  ऐसे कितने दिन और साल बीते 
      किसी को याद न आयी राष्ट्रभाषा की 
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     अंग्रेजी स्कूल में पढ़ लिख कर 
     बने डॉक्टर और इंजीनियर 
     हुईं मशक़्कत अब रोज़ी रोटी की
     और  हुआ सामना अनपढ़ और गरीब 
        बेहाल मरीज़ों और मज़दूरों से 
     अंग्रेजी का दिमाग़ सोचे क्या  और कैसे बोले ?
       गले में अटक गयी अंग्रेजी कंकड सी 
        ज़ुबान भी कुछ ऐंठ गयी 
        रोज़ी रोटी की चिंता में 
        हिंदी   ही तारणहार बनी 
       पूछे हाल -चाल  अपनी बोली में 
        बिन हिंदी बोले   क्या काम  चले?
        
         
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अक्षत पांडे

कुछ ज्यादा नहीं हुआ है, 
 बस  वक़्त की सिलाई उधड़ गयी है '
कि  जिसको  कस के बांधा था, 
कि जिसको  बांध  के सिल दिया था. 
सुबह, दोपहर और  शाम के  धागों से. 
बड़ा अजीब था वो कारखाना,  
कि  जिसमें धागों के रंग कोई भी हों.
सारे  दिन एक से निकलते   थे. 
अब के दिन जैसे नर्म  सफ़ेद चादर,
जिसको नींद आये तो ओढ़ लेता हूँ. 
या किसो भी रंग में रंग लेता हूँ. 
अब भूख भी वक़्त देख कर नहीं लगती .. 
कि जैसे वक़्त से आज़ाद हो गया हूँ. 
और घड़ियों में जंग लगने लगी है. 
कुछ अश्वतथामा  जैसी कैफियत है, 
कि दुनिया  खत्म हुई  हुई तो.. 
इस कैद से बरी हो जाऊँगा...