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अक्षत पांडे, नॉएडा
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बलिश्त भर के थे तुम जब पहली बार देखा था
एक डोर से जुड़े थे अपनी माँ से जिसका कोई सिरा न था,
आँख मेरी गीली थी,न जाने कहाँ से ये नूर उतरा था
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है
नहला -धुला के पौंछ के तुमको, मेरी गोद में रख दिया गया
अपने आप ही मेरे हाथ, एक l शेप का पालना बन गया
एक टुकड़ा मेरी शख्सियत का आज मेरी गोद में सोता है
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है।
नानी दादी मौसी -आया से तुम घिरे रहते थे
सब अपना हक़ जताते थे,
एक पल पकड़ने के लिये तुमको सब आपस में लड़ जाते थे
जो दूर खडे हुए एक मर्द की एक्टिंग करते सोचता है
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है
वो फुदकिया सा इधर उधर बस, घर को नापे रहता है
कभी चादर से, कभी बिस्तर के नीचे से जुगनू सा चमकता है
माँ जब शिकायत तेरी करती ,मैं धीरे से कह देता हूँ, जाने दो अभी छोटा है।
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है,
पहली चोट तुम्हारी वो पहला खूँ तुम्हारा मेरी आँखों में उतर आया था
उधर ज़ख्म भरे तुम्हारे और इधर मैंने दुनिया को माफ कर दिया
जब दर्द हो तुम्हें, कुछ अंदर तक टूटता है
हर बाप भी थोड़ा सा माँ होता है
बड़े हो रहे हो अब, एक दोस्त बनता नज़र आता है मेरा
न कभी तुम जवाँ होना न मैं कभी उम्र दराज़
ताली मारते -साइकिल चलाते और मम्मी की टांग खिंचते गुज़र जाएगी
लोगों को बताना फिर कि ऐसा भी बाप होता है।